राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने बुधवार को लोकसभा में उस संकल्प पर चर्चा में हिस्सा लिया जो लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ पेश किया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के प्रति व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना, संविधान और संसदीय मर्यादाओं की रक्षा से जुड़ा है।

बेनीवाल ने कहा कि भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों का संकल्प है, जिन पर लोकतंत्र आधारित है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष का पद एक तटस्थ और गरिमामय संस्थान के रूप में देखा जाता है और इसकी जिम्मेदारी है कि वह सभी पक्षों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करे, चाहे वे सत्ता पक्ष हों या विपक्ष।

अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल
सांसद ने कहा कि हाल के समय में ऐसी परिस्थितियां पैदा हुई हैं, जिनसे लोकसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने बताया कि विपक्ष की आवाज को दबाना, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा सीमित करना और संसदीय प्रक्रियाओं के संतुलन में कमी लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। यही कारण है कि सदन में इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा की आवश्यकता महसूस की गई।

अमित शाह पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी
बेनीवाल ने गृह मंत्री अमित शाह पर व्यंग्य करते हुए कहा कि एक या दो सदस्य वाली पार्टियों और निर्दलीय सांसदों की स्थिति ऐसे हो गई है जैसे भारत सरकार ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच युद्ध में फंस गई हो। उन्होंने यह बात छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों की भूमिका को रेखांकित करने के लिए कही।

सर्वदलीय बैठकों में शामिल न करने पर नाराजगी
हनुमान बेनीवाल ने लोकसभा अध्यक्ष पर यह भी आरोप लगाया कि बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (बीएसी) और सर्वदलीय बैठकों में एक या दो सदस्य वाली पार्टियों और निर्दलीय सांसदों को शामिल नहीं किया जाता, जिससे उनकी भागीदारी सीमित हो रही है।

उपराष्ट्रपति के उदाहरण का हवाला
बेनीवाल ने अपने वक्तव्य में उपराष्ट्रपति धनखड़ का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर लोकसभा अध्यक्ष से त्यागपत्र लिया गया होता, तो सदन में इस मुद्दे पर विस्तृत बहस की जरूरत ही नहीं पड़ती। उनका कहना था कि वर्तमान स्थिति ने इस विषय पर खुली चर्चा की आवश्यकता स्पष्ट कर दी है।