सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला में हो रहे अवैध खनन को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है और इसे पर्यावरण के लिए अपूरणीय नुकसान का कारण बताया। इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने खनन से जुड़े सभी पहलुओं की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्णय लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमलिया बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में खनन न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी खतरा बन सकता है।

अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर को आदेश दिया है कि वे चार सप्ताह के भीतर ऐसे पर्यावरणविद और वैज्ञानिक सुझाएं, जिनकी विशेषज्ञता खनन और पर्यावरण संरक्षण में हो। उनके नामों के आधार पर उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाएगा, जो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करेगी।

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि अरावली क्षेत्र के कई हिस्सों में अवैध खनन की गतिविधियां जारी हैं। राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को भरोसा दिलाया कि राज्य में किसी भी अवैध खनन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला और उसकी श्रेणियों को परिभाषित करने के अपने 20 नवंबर के आदेश को फिलहाल स्थगित रखा है। अदालत ने कहा था कि नई परिभाषा में कुछ अस्पष्टताएं हैं, जिनका समाधान आवश्यक है।

गौरतलब है कि 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली पर्वतमाला में नई खनन लीज जारी करने पर रोक लगा दी थी। यह रोक तब तक लागू रहेगी जब तक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट नहीं आ जाती। समिति की सिफारिशों और रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की खनन नीतियों और संरक्षण के निर्णय लिए जाएंगे।