उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड को समाप्त कर बनाए गए नए अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को लेकर विवाद तेज हो गया है। इस फैसले के खिलाफ जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने बुधवार को बयान जारी करते हुए सरकार से कानून के क्रियान्वयन पर पुनर्विचार करने की मांग की है। संगठन ने कहा है कि इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही लिया जाना चाहिए और तब तक किसी भी तरह की कार्रवाई को रोक दिया जाए। साथ ही मदरसा संचालकों, उलेमा और विद्यार्थियों से अपील की गई है कि वे मौजूदा हालात को लेकर किसी तरह की चिंता या भय न पालें।

जमीअत के प्रदेश महासचिव मौलाना शराफत अली कासमी ने कहा कि अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत मदरसों की नई व्यवस्था केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह धार्मिक और शैक्षिक अधिकारों से जुड़ा विषय है। उन्होंने तर्क दिया कि यह मान लेना कि मदरसों का अस्तित्व केवल मदरसा बोर्ड पर निर्भर है, ऐतिहासिक और तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि नई व्यवस्था के तहत संस्थानों को दो अलग-अलग विभागों से मान्यता लेने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है, जिससे नियमों के अनुपालन में दिक्कतें आएंगी। धार्मिक शिक्षा का स्वरूप पहले से निर्धारित है, ऐसे में किसी नए प्राधिकरण द्वारा पाठ्यक्रम तय करने की बाध्यता उचित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को ऐसा संतुलित समाधान निकालना चाहिए जो संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और अल्पसंख्यक शिक्षा हितों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके।

इधर, मुस्लिम सेवा संगठन ने भी इस निर्णय पर चिंता जताई है। संगठन ने जिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपकर मदरसा बोर्ड समाप्त किए जाने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। संगठन के अध्यक्ष नईम कुरैशी ने कहा कि मदरसे केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे नैतिक शिक्षा, अनुशासन और सामाजिक मूल्यों के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यवस्था में कमियां हैं तो उसे पूरी तरह समाप्त करने के बजाय सुधार के प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि छात्रों की शिक्षा प्रभावित न हो। संगठन के उपाध्यक्ष आकिब कुरैशी ने भी सरकार से अपील की कि ऐसा समाधान निकाला जाए जिससे शिक्षा व्यवस्था सुचारु बनी रहे और विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।