फलस्तीन को मान्यता देने वाले देशों पर भड़के इस्राइली पीएम नेतन्याहू

ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया द्वारा फलस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे “आतंकवाद को इनाम” बताया और कहा कि फलस्तीनी राज्य की स्थापना कभी नहीं होगी। नेतन्याहू अमेरिका दौरे पर हैं और उन्होंने अमेरिका से लौटने के बाद अपनी प्रतिक्रिया का एलान करने का संकेत दिया।
इजरायली प्रधानमंत्री की प्रवक्ता शोश बद्रोसियन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इजरायल यूरोपीय देशों की राजनीतिक जरूरतों के कारण फलस्तीन को मान्यता नहीं देगा और इसे स्वीकार नहीं करेगा।
वहीं, भारत की विदेश नीति पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने कहा कि पिछले 20 महीनों में भारत की फलस्तीन नीति “शर्मनाक और नैतिक रूप से कमजोर” रही है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में फलस्तीन को मान्यता दी है और अन्य देशों से भी इसी तरह का कदम अपेक्षित है। भारत ने 18 नवंबर 1988 को औपचारिक रूप से फलस्तीन को मान्यता दी थी।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि यह फैसला प्रतीकात्मक है, लेकिन इसे ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मान्यता फलस्तीन की जनता के लिए है, न कि केवल हमास के लिए, और दोनों समुदायों के बीच स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम बढ़ाने की जरूरत है।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर घोषणा की कि उनकी सरकार ने भी फलस्तीन को मान्यता दे दी है। उन्होंने कहा कि यह कदम दो-राज्य समाधान की दिशा में शांति बहाल करने में मदद कर सकता है।
ऑस्ट्रेलिया ने भी औपचारिक रूप से फलस्तीन को मान्यता दी है। यह फैसला गाजा युद्ध और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच आया है और पश्चिम एशिया की राजनीति में बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
दूसरी ओर, अमेरिका और इजरायल ने इस फैसले का विरोध किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यह कदम आतंकवाद को बढ़ावा देगा और गलत संदेश भेजेगा। इजरायली अधिकारियों का कहना है कि जब तक हमास और फलस्तीन आपसी विभाजन से बाहर नहीं आते, तब तक इस तरह की मान्यता प्रभावी नहीं होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व रखता है, लेकिन वेस्ट बैंक और गाजा में फलस्तीन का विभाजन और अंतरराष्ट्रीय राजधानी के न होने के कारण यह पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं हो सकता।
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