पूर्व सीआईए अधिकारी का खुलासा: 'भारत विरोधी था पाक का परमाणु कार्यक्रम

नई दिल्ली। अमेरिका के पूर्व सीआईए अधिकारी रिचर्ड बार्लो ने खुलासा किया है कि पाकिस्तान का परमाणु हथियार विकसित करने का प्राथमिक उद्देश्य शुरू में भारत का मुकाबला करना था। लेकिन इसके निर्माता अब्दुल कादिर खान के नेतृत्व में यह लक्ष्य बदल गया और इसे एक इस्लामी बम में बदल दिया गया, जिसका उद्देश्य ईरान समेत अन्य मुस्लिम देशों तक इस तकनीक को पहुंचाना था।
बार्लो ने न्यूज एजेंसी ‘एएनआई’ से बातचीत में बताया कि 1980 के दशक में वह पाकिस्तान की गुप्त परमाणु गतिविधियों की निगरानी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि 1990 के दशक की शुरुआत में कादिर खान के नेटवर्क ने ईरान को गैस सेंट्रीफ्यूज तकनीक और संभवतः परमाणु हथियारों की योजनाएं भी उपलब्ध कराईं, जिससे तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को दशकों तक तेजी मिली।
बार्लो ने बताया कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम केवल भारत के रणनीतिक संतुलन के लिए नहीं था, बल्कि इसके पीछे व्यापक वैचारिक महत्वकांक्षाएं भी थीं। उन्होंने कहा, “शुरुआत में उद्देश्य भारत को मात देना था, लेकिन अब्दुल कादिर खान और पाकिस्तान के जनरलों ने इसे मुस्लिम बम के रूप में विकसित किया। यह सिर्फ पाकिस्तानी बम नहीं, बल्कि मुस्लिम बम था।“
उन्होंने आगे कहा कि यह विचार अब्दुल कादिर खान का नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टों का था। भुट्टों का मानना था कि विश्व में ईसाई, यहूदी और हिंदू बम हैं, इसलिए मुस्लिम बम की भी जरूरत है। इसके बाद अब्दुल कादिर खान के नेतृत्व में पाकिस्तान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।
अब्दुल कादिर खान: पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के पिता
अब्दुल कादिर खान का जन्म 1936 में भोपाल में हुआ और 1952 में उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। उन्हें पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का पिता माना जाता है और वे दुनिया के सबसे कुख्यात परमाणु तस्करों में शामिल थे। उन्होंने उत्तर कोरिया, ईरान और लीबिया जैसी जगहों को तकनीक मुहैया कराई। उनका निधन 2021 में इस्लामाबाद में हुआ।
बार्लो ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका ने इस नेटवर्क के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं की। उन्होंने कहा कि 1987 और 1988 के बाद वॉशिंगटन ने पाकिस्तान के गुप्त परमाणु सौदों के खिलाफ 20 से 24 साल तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने बताया कि ईरान के गैस सेंट्रीफ्यूज निर्माण में पाकिस्तान की मदद के बिना कभी सफलता नहीं मिल सकती थी। हालांकि बाद में ईरान ने अपने दम पर काफी प्रगति की, लेकिन इसकी नींव पाकिस्तान की तकनीकी सहायता पर ही आधारित थी।
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