नई दिल्ली। देश के बड़े शहरों में रहने वाले लाखों नौकरीपेशा लोगों के सामने अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या किराए के मकान में रहना अब घर खरीदने से ज्यादा महंगा पड़ने लगा है? दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों से सामने आए ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मकानों का किराया इतनी तेजी से बढ़ा है कि अब कई परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा सिर्फ किराया चुकाने में खर्च हो रहा है।

रियल एस्टेट कंसल्टेंसी कंपनियों एनरॉक और नाइट फ्रैंक के बाजार विश्लेषण के अनुसार, कई प्रमुख शहरों के रिहायशी इलाकों में बीते पांच वर्षों के दौरान किराए में 100 से 150 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका असर यह हुआ है कि पहले जहां मध्यम वर्ग अपनी आय का लगभग एक चौथाई हिस्सा किराए पर खर्च करता था, वहीं अब कई परिवारों की 40 से 50 प्रतिशत कमाई केवल मकान किराए में चली जाती है।

बेंगलुरु और गुरुग्राम में सबसे ज्यादा बढ़ा किराया

बेंगलुरु के आईटी हब व्हाइटफील्ड और आउटर रिंग रोड जैसे इलाकों में किराए में सबसे अधिक उछाल देखने को मिला है। कुछ साल पहले जिस 2 बीएचके फ्लैट का किराया 18 से 22 हजार रुपये के बीच था, वह अब 45 से 55 हजार रुपये प्रति माह तक पहुंच गया है। कई गेटेड सोसायटियों में किराए में 120 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है।

दिल्ली-एनसीआर में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स रोड और सोहना रोड जैसे इलाकों में 3 बीएचके फ्लैट का किराया पांच साल पहले 35 से 40 हजार रुपये के आसपास था, जो अब 75 से 90 हजार रुपये प्रति माह तक पहुंच चुका है। वहीं नोएडा के प्रीमियम सेक्टरों में भी किराए में दोगुनी वृद्धि देखी गई है।

मुंबई अब भी सबसे महंगा शहर

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई अब भी सबसे महंगे रेंटल मार्केट के रूप में बनी हुई है। लोअर परेल और बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) के आसपास स्थित रिहायशी टावर्स में 2 बीएचके फ्लैट का मासिक किराया अब 1.20 लाख से 1.50 लाख रुपये तक पहुंच गया है। ठाणे और नवी मुंबई जैसे इलाकों में भी किराए में 70 से 90 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है।

बढ़ी रेंटल यील्ड, मकान मालिकों को फायदा

रियल एस्टेट विशेषज्ञों के मुताबिक, बढ़ते किराए का सबसे ज्यादा फायदा मकान मालिकों और निवेशकों को मिल रहा है। पहले जहां रिहायशी संपत्तियों पर रेंटल यील्ड 2 से 3 प्रतिशत के बीच रहती थी, वहीं अब बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में यह बढ़कर 4.2 से 4.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

रेंटल यील्ड का मतलब है कि मकान की कुल कीमत के मुकाबले मालिक को सालभर में किराए से कितना रिटर्न मिलता है। महामारी के बाद दफ्तरों के दोबारा खुलने और कर्मचारियों की वापसी से किराए की मांग तेजी से बढ़ी, जबकि मकानों की उपलब्धता सीमित रही। ऐसे में मकान मालिक हर साल 10 से 15 प्रतिशत तक किराया बढ़ा रहे हैं।

किराया और ईएमआई के बीच घट रहा अंतर

रियल एस्टेट बाजार में एक और बड़ा बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि अब कई इलाकों में मकान का किराया और होम लोन की ईएमआई के बीच का अंतर काफी कम हो गया है।

उदाहरण के तौर पर, गुरुग्राम और बेंगलुरु के कुछ इलाकों में तीन बेडरूम वाले फ्लैट का किराया 65 से 80 हजार रुपये प्रति माह तक पहुंच चुका है। वहीं करीब एक करोड़ रुपये के होम लोन पर मासिक ईएमआई लगभग 85 से 95 हजार रुपये बैठती है। यानी दोनों के बीच का अंतर कई मामलों में सिर्फ 15 से 20 हजार रुपये का रह गया है।

यही वजह है कि अब बड़ी संख्या में लोग किराए के बजाय घर खरीदने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

युवाओं का बदल रहा नजरिया

विशेषज्ञों का कहना है कि किराए और ईएमआई के बीच बदलते समीकरण ने युवाओं की सोच भी बदल दी है। पहले जहां ज्यादातर लोग 30 वर्ष की उम्र के बाद घर खरीदने की योजना बनाते थे, वहीं अब 25 से 28 वर्ष की उम्र में ही होम लोन और प्रॉपर्टी विकल्पों की तलाश शुरू हो रही है।

हालांकि, इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। मेट्रो शहरों में मकानों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, डाउन पेमेंट के लिए बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं है और बैंकों की कड़ी शर्तें भी लोगों के फैसले को प्रभावित करती हैं।

बदल रहा है रियल एस्टेट का पूरा गणित

पिछले पांच वर्षों में मेट्रो शहरों के रेंटल बाजार का स्वरूप तेजी से बदला है। पहले किराया केवल रहने का खर्च माना जाता था, लेकिन अब यह घर खरीदने के फैसले को प्रभावित करने वाला एक बड़ा आर्थिक कारक बन चुका है। बढ़ते किराए, ऊंची रेंटल यील्ड और ईएमआई के साथ घटते अंतर ने मध्यम वर्ग को अपनी वित्तीय प्राथमिकताओं पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। आने वाले समय में 'किराया बनाम ईएमआई' की यह बहस और तेज होने की संभावना है।