कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन गैस माइग्रेशन विवाद से जुड़े देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट कानूनी मामलों में से एक पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और उसकी विदेशी साझेदार कंपनियों ने केंद्र सरकार के साथ चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता प्रक्रिया अपनाने की इच्छा जताई।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली भी शामिल हैं।

कंपनियों ने क्या कहा अदालत में

सुनवाई के दौरान रिलायंस और उसकी सहयोगी कंपनियों की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि सभी याचिकाकर्ता बुधवार को ही केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध करेंगे। साथ ही यह भी आग्रह किया गया कि जब तक मध्यस्थता जारी रहे, तब तक सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई को स्थगित किया जाए।

केंद्र सरकार ने किया विरोध

केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटारमानी ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि फिलहाल अदालत में सुनवाई जारी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि मध्यस्थता प्रक्रिया में कोई प्रगति होती है, तो सरकार उसे अदालत के संज्ञान में लाएगी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई रोकने से इनकार करते हुए कहा कि यदि दोनों पक्ष सफल मध्यस्थता की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो मामले का समाधान संभव है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि मध्यस्थता से समाधान निकलता है तो यह बेहतर स्थिति होगी और उसके आधार पर मामले का निपटारा किया जा सकता है।

लंबा चल रहा है विवाद

गौरतलब है कि 19 मई से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट अंतिम सुनवाई कर रहा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज, BP एक्सप्लोरेशन (अल्फा) लिमिटेड और निको लिमिटेड ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के उनके पक्ष में आए निर्णय को रद्द कर दिया गया था।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 14 फरवरी 2025 को दिए गए आदेश में सिंगल जज बेंच के फैसले को पलटते हुए मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के फैसले को खारिज कर दिया था, जबकि पहले वही फैसला कंपनियों के पक्ष में था।

क्या है पूरा मामला

यह विवाद कृष्णा-गोदावरी बेसिन में गैस माइग्रेशन से जुड़ा है। केंद्र सरकार का आरोप है कि कंपनियों ने उन गैस भंडारों से उत्पादन किया, जिन पर उनका अधिकार नहीं था, जिससे सरकार को भारी नुकसान हुआ।

सरकार ने इस कथित नुकसान के एवज में लगभग 1.55 अरब अमेरिकी डॉलर की मांग की थी। हालांकि, जुलाई 2018 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने 2-1 के बहुमत से सरकार के दावे को खारिज करते हुए कंपनियों के पक्ष में फैसला दिया था और उन्हें 8.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर का मुआवजा देने का आदेश दिया था।