अपने पूर्वजों, महापुरुषों, महानायकों, राष्ट्र के हितार्थ सर्वस्व समर्पित करने वाले बलिदानियों को याद रखना जीवन्त एवं जागरुक समाज की निशानी है। गत 29 अप्रैल को क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक एकता के लिये समर्पित, शिक्षा के प्रसार में सक्रिय योगदान देने वाले महान् देशभक्त और आजादी के लिए विदेशों में अलख जगाने वाले आर्यन पेशवा राजा महेंद्र प्रताप सिंह की 47वीं पुण्यतिथि पर देश के अनेक राजनीतिज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं बुद्धिजीवियों ने उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किये, यह जागृत समाज की निशानी है।
पुरानी पीढ़ी के लोगों की अभिरुचि पुरातन, गुज़रे हुए ज़माने को याद करने की रहती है। भारतीय संस्कृति और उसका इतिहास मिटने और मिटाये जाने के बाद भी आंशिक रूप से अनेक साक्ष्यों में सुरक्षित है, यह संतोष की बात है। पुस्तक प्रकाशन, फोटोग्राफी एवं डिजिटलाइजेशन ने इस सुरक्षा को पुख्ता किया है। विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ठ हस्तियों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व की गौरवगाथाएं पुस्तकाकार रूप में आई है, आ रही हैं।
मेरे छोटे भ्राता चि. राजगोपाल सिंह वर्मा ने कठोर परिश्रम से राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की राष्ट्रभक्ति, उनकी सर्वजन हिताय तथा शिक्षाक्षेत्र में उनके जीवनवृत्त, भारत की स्वतंत्रता के लिए कठोर संघर्ष तथा शिक्षा के प्रसार में योगदान आदि प्रत्येक पहलू पर प्रामाणिक और पुख्ता जानकारियां उपलब्ध कराते हुए एक पुस्तक 'राजा महेन्द्र प्रताप सिंह' पर लिखी है। राजाजी के जीवन से जुडे संदर्भों तथा जानकारी एकत्र करने में श्री वर्मा ने हजारों अभिलेखों, पत्रों, संदर्भों पुस्तक-पत्रिकाओं एवं विशेषांकों को टटोला और राजाजी से संबंधित लोगों से भेंट की, सम्पर्क किया, पुस्तकालय-संग्रहालय गए। उन्होंने कठोर परिश्रम एवं गंभीर, सतर्क अध्ययन के पश्चात यह पुस्तक लिखी है। पुस्तक की विषय सूची एवं प्राक्कथन पढ़ने को देख कर ही ज्ञात हो जाता है कि राजगोपाल सिंह वर्मा ने इसे तथ्यात्मक एवं प्रामाणिक बनाने में कितना परिश्रम किया है। प्रथम भाग मे राजाजी का भारत से निर्वासन, ब्रिटिश सरकार का विरोध और संघर्ष का बेखव, एक राष्ट्रवादी के रूप में निर्वासित सरकार की प्राथमिकता, पृष्ठभूमि और वातावरण, आरंभिक जीवन, वैवाहिक संबंध, परिवार और यात्राएं, वृन्दावन में गुरुकुल स्थापना के सहयोग और शैक्षणिक क्षेत्र में योगदान, प्रेम महाविद्यालय, प्रेम और भक्ति की भावना एक संपादक-लेखक के रूप में, विचारों की अभिव्यक्ति और अस्पृश्यता का विरोधी, विश्वसंघ, व्यापारिक रास्तों की खोज, साम्राज्यवाद के विरुद्ध विदेशी शुभचिंतकों की सहायता से आगे बढ़ना, घर वापिसी की और निर्वासन से वापिसी जैसी घटनाओं की प्रामाणिक जानकारियां दी गई हैं।
पुस्तक के द्वितीय भाग में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के सांसद बनने और नोबल पुरस्कार के नामांकन तथा उनके संस्मरण आदि का वर्णन है। 332 पृष्ठों की पुस्तक में एक भारतीय राजा के आम आदमी समर्थक जनसेवक होने की पूरी गाथा वर्णित है। पुस्तक को नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य 450 रुपये है।
इस प्रकार राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के जीवन की यह पुस्तक प्रामाणिक दस्तावेज है।
राजाजी का मुजफ्फरनगर से नज़दीकी संबंध था। मोलाहेड़ी रियासत में रिश्तेदारी थी। नगर के प्रमुख समाजसेवी एवं रोटरी इंटरनेशनल के डिस्ट्रिक्ट 310 के गवर्नर स्व. कृष्ण गोपाल रईस से उनकी गहरी मित्रता थी । राजपुर (देहरादून) जाते हुए वे उनके मोतीमहल वाली हवेली में उनके साथ ठहरते थे। राजाजी के कई संस्मरण उन्होंने मुझे सुनाये थे। वे राजाजी की सादगी एवं मानवतावादी दृष्टिकोण से बहुत प्रभावित थे। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का पिताश्री स्व. राजरूप सिंह वर्मा से भी संबंध था। 60 के दशक में वे 'देहात भवन' में पधारे थे। मुजफ्फरनगर के प्रमुख राष्ट्रीय विचारक तथा शिक्षाविद् महेन्द्राचार्य जी से भी उनका परिचय था। राजाजी के साथ अपने ग्रुप फोटोग्राफ को आचार्य जी ने संजोकर रखा हुआ है। सच में यह अनमोल निधि है।
राजाजी की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके नाम पर अलीगढ़ में विश्वविद्यालय की स्थापना कराके प्रशंसनीय कार्य किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था। वि.वि. में पढ़ाई आरंभ हो चुकी है। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह सरस्पर प्रेम व भाईचारे के प्रबल समर्थक थे। ऐसी महान् विभूति को जन्मदिन या पुण्यतिथि पर ही नहीं, हरदम याद रखने की जरुरत है। उनकी स्मृति को हमारा प्रणाम।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'