एक जनपद, एक व्यंजन, योजना के अन्तर्गत मुजफ्फरनगर जनपद से पेड़ा, चाट एवं गुड़ से बने उत्पादों को चयनित किया गया है। इन खाद्य पदार्थों की मार्केटिंग, ब्रांडिंग, संवर्द्धन के प्रति राज्य सरकार बहुत सतर्क एवं सजग है। व्यंजनों की गुणवत्ता बनाये रखने के उद्देश्य से जिला अधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति की हर महीने एक समीक्षा बैठक होगी। शासन ने चयनित व्यंजनों के मेलों में स्टाल लगाने वाले विक्रेताओं को अनुदान (प्रतिपूर्ति) देने का भी निर्णय लिया है।
मुजफ्फरनगर जिला अपने गुड़, शक्कर, खांड उत्पादन के लिये शताब्दियों से प्रसिद्ध है। जब तक जिले में चीनी मिल नहीं स्थापित हुए थे, तब गुड़ व शक्कर, खांडसारी व कंद (फिल्टर खांड का सफेद लड्डू) का बोल बाला था। आज भी मुजफ्फरनगर एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मंडी के नाम से प्रसिद्ध है। मैंने 2 वर्ष पूर्व मुजफ्फरनगर के गुड़ पर लेख प्रकाशित किया था और योगी सरकार से गन्ना उत्पादकों, गुड़-शक्कर निर्माताओं की स्थिति में सुधार करने तथा इस उद्योग में प्रविष्ट कर गए गुड़ माफियाओं को प्रतिबंधित करने की मांग की थी।
मुजफ्फरनगर के चयनित व्यंजन में पेड़े को स्थान दिया हुआ है। भोपा क्षेत्र का सीकरी गांव अपने स्वादिष्ट पेड़ों के लिये दशकों से प्रसिद्ध है। इसके बनाने की शुरुआत किसने की, इसकी जानकारी अब उपलब्ध नहीं है लेकिन यह तथ्य है कि सीकरी का पेड़ा आज भी प्रसिद्ध है। इसकी धूम पाकिस्तान तथा अरब देशों तक है। गांवों से हिन्दुओं के पलायन के बाद यह व्यवसाय मुस्लिम हलवाइयों के हाथ में आ गया है। मुझे पत्रकार एवं एडवोकेट श्री एम. रहमान की बारात में सीकरी जाने का मौका मिला। वहां पहुंच कर मुझे पेड़ा खरीदने की जिज्ञासा हुई। बाजार में एक दुकान पर गया, तो दुकान के समीप एक अजनबी सज्जन ने रोक कर पूछा- 'क्या वकील साहब की बारात में आये हो? पेड़े खरीदोगे? मैंने हां में सिर हिलाया तो बोले- 'ये पेड़े आपके खरीदने लायक नहीं!' मैंने सवालभरी नजरों से देखा तो बोले- 'इनमें असली मावा कम, सूखी रोटियां ज्यादा है।' फिर बताया- पहले दूध को औटा कर उसका मावा (खोया) तैयार किया जाता था। फिर उस खोये में कई बार दूध डाल कर लाल सुर्ख मावा बनाते थे, जिससे पेड़े तैयार होते थे। अब ये हलवाई दूध में सूखी रोटियां डाल घोंटते हैं जो मावे में बदल जाती हैं। मैंने पेड़े खरीदने का विचार त्याग दिया।
कुछ वर्ष पूर्व में श्री दीपक कुमार (पूर्व मंत्री) के साथ उनके नूरपुर स्थित पेट्रोल पंप पर जा रहा था। छपार पहुंचने पर बाई ओर कार रोकी और बोलें 'आप को यहां का मशहूर पेड़ा खिलाता हूं।' बोले- एक लाऊं या दो? मैंने सोचा एक पेड़े से क्या होगा किन्तु संकोचवश मैंने एक पेड़ा लाने को कहा। देखा तो एक पेड़े से पूरा दोना भरा हुआ था। दो सौ ग्राम से कम न होगा। स्वाद भी अनोखा था।
एक बार उन्होंने पुरकाजी के गुप्ता चाट भंडार की चाट खिलवाई जिस चाट का स्वाद लाजवाब था।
मिठाई की बात करें तो बुढ़ाने की सांवरिया की रसभरी खस्ता बालूशाही का जवाब न था। कभी देसी घी में बनी सांवरिया की बालूशाही एक सेर में चार चढ़ती थीं यानी एक का वजन पावभर।
जानसठ तहसील के सामने हरिया हलवाई की दुकान पर की बनी कलाकंद का दूर-दूर तक डंका था। इसी प्रकार मीरापुर के जगन्नाथ उर्फ जगना हलवाई के तिलबुगो की एक समय धूम रही। बड़े भाई सत्यवीर अग्रवाल जब दिल्ली जाते, तब नेताजी राज नारायण एवं स्व. जनेश्वर मिश्रा के लिये मीरापुर का जगने हलवाई का तिलबुग्गा ले कर जाते थे।
किसी समय शहर में सरवट गेट के बहाल हलवाई, कोर्ट रोड पर मौलाहेडी हाउस के समीप लाला मूलचंद, भगत सिंह रोड स्थित भुल्लन हलवाई और अबूपुरा के फुल्लू हलवाई का जलवा था। भुल्लन हलवाई के देसी घी से बने बेसन के लड्डू लाजवाब थे। मेरठ रोड पर अरुण प्रेस के सामने कौशिक टी स्टाल के बेसन के लड्डू बेहद स्वादिष्ट होते थे। फुल्लू हलवाई का काली (बैंगनी) गाजर का सूखी मेवाओं के साथ बना हलुवा दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। दाल मंडी के मुहाने के पास मोती हलवाई की पुरानी दुकान थी। गृहस्थी भी कचौरियां, सूखे आलू की जायकेदार सब्जी पैक करा कर घर ले जाते थे। सर्राफा बाजार (मंदिर की दुकान) वाला ओमी हलवाई सिर्फ जलेबी एवं इमरती बनाते थे। एक सेर में 100 रसदार करारी इमरती बनाने की महारथ उन्हें हासिल थी। कभी दुकान पर खरीदारों का तांता लगा रहता था। उत्तर प्रदेश सूचना विभाग के डिप्टी डायरेक्टर स्व. ध्रुव मालवीय ने हमारे घर पर ओमी हलवाई की इमरतियों का स्वाद चखा था। एक बार वे दिल्ली में होने वाली गणतंत्र दिवस परेड में उत्तर प्रदेश की झांकी लेकर आए थे। अगले दिन परेड में प्रतिभाग करने वालों व स्टाफ को लखनऊ रवाना कर दिया और पिताश्री राजरूप सिंह वर्मा से मिलने मुजफ्फरनगर चले आए। बेतकल्लुफ होकर बोले- चौधरी साहब, वो ही इमरतियां मंगाओ' फिर नि:संकोच होकर इमरतियां खाई।
जब पंडित कमलापति त्रिपाठी (मुख्यमंत्री) 'देहात' भवन पधारे तब अंसारी रोड स्थित बुद्धू मल हलवाई की दुकान से लौकी की लौज मंगाई थी। जब पंडित जी ने एक बर्फी उठा कर प्लेट में रखी तब उनके सहायक ने रोक दिया, बोला- 'सर इसमें बहुत मीठा है।' उन्होंने कहा- 'मिठाई में तो मीठा होता ही है।' और पंडित जी ने एक के बजाय दो बर्फियां खाई।
नई मंडी के सूरजबली-चांदबली की जायकेदार चाट पूरे जिले में मशहूर थी। पत्रकार राधेश्याम महेश्वरी से पिताश्री और मैं मिलने जाते तब सूरजबली-चांदबली की चाट खिलाये बिना आने न देते थे। अपने मकान के गृह प्रवेश समारोह में उन्होंने सूरजबली-चांदबली की चाट और मेवाओं से भरे मक्खन के समोसे खिलाये थे।
शामली के बनबटे की चाट और बड़े बाजार में बना प्रसिद्ध घेवर दिसावर तक जाता था। अरुण प्रेस के बगल में राजन की चाट इतनी पसंदीदा है कि शाम होते ही शौकीन ग्राहकों की दुकान पर भीड़ लग जाती है। कैराना (शामली) की मलाई दार कुल्फी लखनऊ के अमीनाबाद वाले प्रकाश फालूदे वाले की कुल्फी को मात करती थी। जहां तक गुड़ से बने पदार्थों का प्रश्न है, जनपद में इस का कोई बाई प्रोडक्ट तैयार नहीं होता। अलबत्ता दशकों पहले गुड़ में पगे मोटे सेल और चने की दाल की चक्की (टिक्की) खूब बनती थी। जब इनकी ग्राहकी बंद हो गई तो यहां बननी भी बन्द हो गई। अब तो मूंगफली की पट्टी खारी बावली दिल्ली से यहां आती है। हालांकि गुड़ की कई किस्में- अंगरखी, लड्डू या सूंठीया, मिझा व खुरपा पाड़, रसकट आदि सीजन में बहुतायत से मंडी में आता है। दालमंडी की गली के शुरू में चाट की दुकान ने अपनी पुरानी क्वालिटी तथा स्वाद को बरकरार रखा हुआ है। इसी तरह पुरानी घासमंडी के सामने, पंचमुखी मोहल्ले की चाट भंडार की आलू की करारी टिक्की तथा मूंग की दाल की पकौड़ियों गुजियों का स्वाद भी निराला है।
अब इन दुकानों को चौथी, पांचवीं पीढ़ी संचालित कर रही है। उन्होंने नये ज़माने के अनुरूप खुद को ढाल लिया है। सफलता की कामना है।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'