संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने सऊदी अरब की ओर से लगाए गए उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि यूएई के दो जहाजों ने यमन में अलगाववादी गुटों को हथियार और सैन्य वाहन मुहैया कराए। यूएई ने इन आरोपों पर हैरानी जताते हुए स्पष्ट किया कि संबंधित वाहन यमन में तैनात अमीराती बलों के उपयोग के लिए भेजे गए थे और इसकी जानकारी सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन को पहले से दी गई थी।
यूएई के अनुसार, इन गतिविधियों को गठबंधन के साथ समन्वय में अंजाम दिया गया था और इसमें किसी भी तरह का गुप्त या एकतरफा कदम शामिल नहीं था। इसके बावजूद सऊदी अरब की प्रतिक्रिया ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव को हवा दे दी है।
सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर यूएई की कथित कार्रवाई को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने यमन के मुकल्ला बंदरगाह पर सीमित हवाई हमले किए, जिन्हें इस पूरे विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। सऊदी अरब ने यूएई पर यमन में “बेहद गंभीर” कदम उठाने का आरोप लगाया है, जिससे खाड़ी क्षेत्र के दो अहम सहयोगियों के रिश्तों में खटास आ गई है।
अरब लीग ने जताई चिंता, संयम की अपील
इस बीच, अरब लीग के महासचिव अहमद अबुल घेइत ने यमन में बिगड़ते हालात पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने सभी पक्षों से तनाव कम करने और संयम बरतने की अपील की। घेइत ने कहा कि मौजूदा स्थिति उस समय पैदा हुई है, जब सरकार राष्ट्रपति नेतृत्व परिषद की मांगों पर प्रभावी प्रतिक्रिया देने में विफल रही है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर किए गए अपने संदेश में उन्होंने अरब लीग के सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे इस संवेदनशील दौर में एकजुटता बनाए रखें और यमन की वैध सरकार के समर्थन में साझा अरब रुख अपनाएं। उन्होंने यह भी कहा कि यह अपील अरब लीग परिषद द्वारा यमन संकट पर पहले पारित प्रस्तावों के अनुरूप है।
यूएई ने आतंकवाद रोधी बलों की तैनाती समाप्त की
इसी बीच यूएई के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि उसने यमन में तैनात अपनी आतंकवाद विरोधी इकाइयों की तैनाती स्वेच्छा से समाप्त कर दी है। यह जानकारी सरकारी समाचार एजेंसी डब्ल्यूएएम के माध्यम से दी गई। मंत्रालय ने बताया कि हालिया घटनाओं की व्यापक समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2019 में यमन से मुख्य सैन्य वापसी के बाद आतंकवाद निरोधक इकाइयां ही वहां यूएई की आखिरी सक्रिय सैन्य मौजूदगी थीं। इस कदम को यमन में बदलते हालात के संदर्भ में एक अहम रणनीतिक फैसला माना जा रहा है।