ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों और अमेरिका के साथ लगातार बढ़ते तनाव के बीच सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। इन तस्वीरों में ईरान के दो प्रमुख परमाणु ठिकानों पर नई गतिविधियां दिखाई दे रही हैं। ये वही ठिकाने हैं, जिन्हें जून में इजरायल के साथ 12 दिन तक चले युद्ध के दौरान अमेरिकी हमलों में भारी नुकसान पहुंचा था।
ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर सार्वजनिक रूप से बेहद सीमित जानकारी साझा करता है। ऐसे में हालिया तस्वीरों से यह आशंका और गहरी हो गई है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है, तो हालात बेहद खतरनाक मोड़ ले सकते हैं।
रणनीति बदली, जमीन के नीचे सुरक्षा
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ईरान अपने परमाणु संसाधनों को हर हाल में सुरक्षित रखने की कोशिश में जुटा है। फोर्डो और नटांज परमाणु केंद्रों की सैटेलाइट तस्वीरों में देखा गया है कि ठिकानों के आसपास मिट्टी के ऊंचे ढेर बनाए गए हैं और मलबे के ऊपर अस्थायी ढांचे खड़े किए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि यूरेनियम भंडार को जमीन के भीतर काफी गहराई में ले जाया जा रहा है, ताकि किसी संभावित हमले का असर कम से कम हो। इसे ईरान की नई ‘किलेबंदी रणनीति’ के तौर पर देखा जा रहा है।
ट्रंप की सख्त चेतावनी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 28 जनवरी 2026 को ईरान को लेकर अपने रुख को और कठोर बनाते हुए कहा कि अगर तेहरान अमेरिकी शर्तों को स्वीकार नहीं करता, तो उस पर “तेज और निर्णायक” कार्रवाई की जा सकती है। इस बयान के बाद पेंटागन ने भी सैन्य तैयारियां तेज कर दी हैं। विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन को विध्वंसक जहाजों, बमवर्षकों और लड़ाकू विमानों के साथ ईरान के आसपास तैनात किया गया है।
अमेरिका की प्रमुख शर्तें
वॉशिंगटन की मांगों में ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करना, बैलिस्टिक मिसाइल विकास पर रोक लगाना और हमास, हिज़्बुल्लाह व हूती जैसे संगठनों को दिया जा रहा समर्थन बंद करना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक दबाव और आंतरिक असंतोष से जूझ रहे ईरान पर यह रणनीति दूरगामी प्रभाव डाल सकती है।
हालांकि ईरान के पास परमाणु हथियार विकसित करने की तकनीकी क्षमता मानी जाती है, लेकिन उसने अब तक औपचारिक रूप से यह कदम नहीं उठाया है। ऐसे में किसी सैन्य हमले का संकेत यह संदेश देता है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन भी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।
सत्ता परिवर्तन की अनिश्चितता
47 वर्षों से सत्ता में रही इस्लामिक गणराज्य की संस्थाएं ईरानी समाज में गहराई तक स्थापित हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी स्वीकार किया है कि यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है, तो उसके परिणामों का कोई सरल अनुमान नहीं लगाया जा सकता। 9.3 करोड़ की आबादी, मजबूत सुरक्षा ढांचा और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स जैसी शक्तिशाली संस्थाएं किसी भी बदलाव को अत्यंत जटिल बना देती हैं। विशेषज्ञों को आशंका है कि ऐसी स्थिति में परमाणु सामग्री और विशेषज्ञों पर नियंत्रण कमजोर पड़ सकता है।
इतिहास से मिलते संकेत
इतिहास में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के बावजूद देशों को सैन्य हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा। लीबिया ने 2003 में अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म किया, लेकिन बाद में उस पर हमला हुआ। यूक्रेन ने 1994 में परमाणु हथियार छोड़े, फिर भी उसे क्षेत्रीय आक्रमण झेलना पड़ा। जून 2025 में ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हुए हमलों ने इस धारणा को और मजबूत किया कि केवल संयम सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
वैश्विक असर की आशंका
ईरान पर किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। सऊदी अरब पहले ही संकेत दे चुका है कि ईरान के परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में वह भी वैसा ही कदम उठा सकता है। तुर्किये ने स्वतंत्र परमाणु क्षमता में रुचि दिखाई है, जबकि एशिया में जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अमेरिकी सुरक्षा आश्वासनों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। विश्लेषकों के अनुसार, ईरान पर हमला अमेरिका की क्षेत्रीय पकड़ को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर सकता है और दुनिया को यह संदेश दे सकता है कि असली सुरक्षा केवल परमाणु हथियारों के पास होने से ही मिलती है।