नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराए जाने की संभावना को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार जनगणना के दूसरे चरण और चुनावी प्रक्रिया के बीच टकराव से बचने के लिए इन राज्यों में इसी साल के अंत तक मतदान कराने के विकल्प पर विचार कर रही है।
इन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी-मार्च के दौरान होने हैं, लेकिन इसी अवधि में देशव्यापी जनगणना का दूसरा चरण भी प्रस्तावित है। ऐसे में प्रशासनिक और मानव संसाधन संबंधी चुनौतियों को देखते हुए चुनाव कार्यक्रम में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व ने भी संभावित स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी राज्य इकाइयों को चुनावी तैयारियां तेज करने के निर्देश दिए हैं। संगठन स्तर पर बूथ समितियों के गठन, लंबित नियुक्तियों को पूरा करने और जमीनी स्तर की तैयारियों को जल्द अंतिम रूप देने को कहा गया है।

बताया जा रहा है कि जनगणना का दूसरा चरण फरवरी में प्रस्तावित है, जिसके लिए बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। अकेले उत्तर प्रदेश में लाखों कर्मचारियों को इस कार्य में लगाया जा सकता है। पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में भी बड़ी संख्या में सरकारी कर्मियों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में चुनाव कराने के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
हालांकि चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि उन्हें फिलहाल चुनाव की तारीख आगे बढ़ाने या पहले कराने को लेकर कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। उनका मानना है कि यदि चुनाव इस साल के अंत में कराए जाते हैं तो मतदाता सूची इससे प्रभावित नहीं होगी, क्योंकि संबंधित राज्यों में मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
इस बीच भाजपा की उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड इकाइयों से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि संगठन को जल्द चुनाव की संभावना को ध्यान में रखकर तैयार रहने को कहा गया है। बताया जा रहा है कि जुलाई के पहले सप्ताह तक कई संगठनात्मक कार्य पूरे करने का लक्ष्य रखा गया है।
उत्तराखंड को लेकर स्थिति कुछ अलग बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में जनगणना से जुड़ी कई प्रक्रियाएं पहले ही पूरी हो सकती हैं, इसलिए वहां चुनाव कार्यक्रम में बदलाव की संभावना अपेक्षाकृत कम मानी जा रही है।
उधर, संभावित समयपूर्व चुनाव की चर्चाओं ने विपक्षी दलों की सक्रियता भी बढ़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हाल ही में विपक्षी गठबंधन की बैठक में भी इस मुद्दे पर नेताओं के बीच विचार-विमर्श हुआ। ऐसे में आने वाले महीनों में इन राज्यों की राजनीति और अधिक गर्माने के संकेत मिल रहे हैं।