तिरुवनंतपुरम। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि वैश्विक स्तर पर वही देश और समाज प्रभावी माना जाता है, जिसके पास पर्याप्त शक्ति और सामर्थ्य होती है। उन्होंने कहा कि केवल सही होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखने के लिए मजबूत होना भी जरूरी है।

RSS के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम के तहत आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर शक्ति संतुलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया कई बार नैतिकता से ज्यादा ताकत को महत्व देती है और इसी आधार पर फैसले प्रभावित होते हैं।

भागवत ने कहा कि संघ का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित, सशक्त और एकजुट बनाना है। उनके अनुसार, सामाजिक समरसता और आपसी अपनापन ही किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है। उन्होंने कहा कि संघ लंबे समय से इसी दिशा में कार्य कर रहा है।

उन्होंने कहा कि RSS द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला 'हिंदू' शब्द केवल किसी एक पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान का प्रतीक है, जिसमें विभिन्न परंपराएं और मान्यताएं शामिल हैं।

संघ प्रमुख ने कहा कि स्वयंसेवक विभिन्न समुदायों के लोगों से संवाद करते हैं और भारतीय संस्कृति, साझा विरासत तथा पूर्वजों के आधार पर एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान की बात रखते हैं। हालांकि, इस विषय पर अलग-अलग लोगों के अलग विचार हो सकते हैं।

भागवत ने यह भी कहा कि RSS दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है, लेकिन इसके बारे में कई तरह की धारणाएं प्रचलित हैं। उन्होंने कहा कि संघ को बाहर से देखकर समझना आसान नहीं है, क्योंकि इसकी कार्यप्रणाली और उद्देश्य को नजदीक से जानने की आवश्यकता होती है।