कटक। उड़ीसा हाई कोर्ट ने फैमिली पेंशन से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि हिंदू कर्मचारी द्वारा पहली पत्नी के जीवित रहते की गई दूसरी शादी को कानून मान्यता नहीं देता। अदालत ने कहा कि भले ही बाद में पहली पत्नी का निधन हो जाए, लेकिन दूसरी शादी वैध नहीं मानी जा सकती और ऐसी स्थिति में दूसरी महिला फैमिली पेंशन की पात्र नहीं होगी।
यह फैसला एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जो मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी कनक लता द्विवेदी की ओर से दायर की गई थी। याचिका में फैमिली पेंशन से वंचित किए जाने के सरकारी आदेश को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने साफ कहा कि कानून की नजर में दूसरी पत्नी को विधवा का दर्जा भी प्राप्त नहीं होता, इसलिए पेंशन का अधिकार नहीं बनता।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पेंशन नियमों में ‘पत्नी’ या ‘पत्नियां’ शब्द का उल्लेख है, इसलिए उन्हें लाभ मिलना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि फैमिली पेंशन के लिए वैध विवाह होना अनिवार्य शर्त है। अवैध विवाह के आधार पर किसी भी तरह का पेंशन लाभ नहीं दिया जा सकता।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करना अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे रिश्ते को मान्यता देना न सिर्फ कानून के खिलाफ होगा, बल्कि समाज में गलत परंपराओं को भी बढ़ावा देगा। इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
यह विवाद तब सामने आया था, जब कंट्रोलर ऑफ अकाउंट्स कार्यालय ने फैमिली पेंशन के लिए किए गए दावे को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि आवेदिका मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी है और उसकी शादी पहली पत्नी के रहते हुई थी। भले ही पहली पत्नी का बाद में निधन हो गया हो, लेकिन विभाग ने दूसरी शादी को अवैध मानते हुए पेंशन देने से इनकार कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया निर्णय का भी हवाला दिया, लेकिन हाई कोर्ट ने दो टूक कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम लागू होने के बाद एक से अधिक विवाह की अनुमति नहीं है। अदालत ने यह भी चेताया कि इस तरह के तर्क स्वीकार करना सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकता है।