सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक वैवाहिक विवाद मामले में जुड़वां बच्चों को उनकी मां से अलग करने के प्रयास को बेहद क्रूर कदम करार दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारी की पीठ ने डेढ़ साल के बच्चों को मां से दूर रखने की कोशिश करने वाले पिता को कड़ी फटकार लगाई।

पीठ ने दोनों माता-पिता को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई के दिन वे अपने बच्चों के साथ अदालत में उपस्थित हों। न्यायाधीशों ने टिप्पणी की, "महज छह महीने के बच्चों को उनकी मां से अलग करना घोर क्रूरता है। बच्चों की भलाई सर्वोपरि है। ऐसा करना न्याय का अपमान है।"

छह महीने के बच्चों को मां से अलग नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छह महीने से छोटे बच्चों को उनकी मां से दूर नहीं रखा जा सकता। इस मामले में पति ने यह याचिका दायर की थी कि पत्नी द्वारा लखनऊ में शुरू किए गए वैवाहिक मामलों को पंजाब स्थानांतरित किया जाए।

पति के वकील का कहना था कि अदालत को बच्चों की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उनके लिए हानि होगी। पीठ ने वकील से कहा कि कोई भी दाई या दादी मां की जगह बच्चों की देखभाल वैसे नहीं कर सकती।

पति का दावा और अदालत की प्रतिक्रिया

पति के वकील ने यह भी कहा कि पत्नी स्वयं वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी और बच्चों को अपने पास रखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती। पीठ ने कहा कि अगर महिला बच्चों की कस्टडी में कोई रुचि नहीं रखती, तो वह यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों लाती।

न्यायमूर्ति मेहता ने टिप्पणी की, "वास्तव में महिला को उसके बच्चों से अलग करके उसके खिलाफ अत्यधिक क्रूरता की गई।" महिला के वकील ने यह भी बताया कि पति शराब पीता था और वीडियो कॉल के जरिए भी बच्चों को देखने नहीं देता था।

अगला आदेश

पीठ ने माता-पिता से पूछा कि अलग रह रहे पति-पत्नी के बीच भरण-पोषण की क्या व्यवस्था है। कोर्ट ने आदेश दिया कि 26 फरवरी को दोनों माता-पिता अपने जुड़वां बच्चों के साथ अदालत में उपस्थित हों, ताकि बच्चों की भलाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा सके।