पहली बार विधायक और सीधे स्पीकर- रथिंद्र बोस ने रचा नया राजनीतिक रिकॉर्ड

पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला, जब Rathindra Bose को विधानसभा का नया अध्यक्ष चुना गया। खास बात यह रही कि वे पहली बार विधायक बने हैं और पहली ही बार में उन्हें सदन की सबसे अहम संवैधानिक जिम्मेदारी सौंप दी गई। आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब उत्तर बंगाल से कोई विधायक विधानसभा स्पीकर बना है।
कूचबिहार दक्षिण सीट से विधायक बने रथिंद्र बोस को भारतीय जनता पार्टी ने 18वीं विधानसभा के लिए स्पीकर पद का उम्मीदवार बनाया था। विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस ने उनके खिलाफ कोई प्रत्याशी नहीं उतारा, जिसके चलते उनका निर्विरोध चयन तय हो गया। सदन में मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे प्रोटेम स्पीकर तपस रॉय ने ध्वनिमत से स्वीकार करते हुए उनकी नियुक्ति की घोषणा की।
रथिंद्र बोस का संबंध कूचबिहार जिले के देबीबारी क्षेत्र से है। उन्होंने बीटी एंड इवनिंग कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक किया और बाद में कोलकाता में चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की परीक्षा में देशभर में पांचवां स्थान हासिल किया। कुछ समय तक वे लंदन में भी रहे, जिसके बाद भारत लौटकर सिलीगुड़ी में बस गए।
विदेश से लौटने के बाद बोस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। उन्होंने लंबे समय तक संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं और वर्तमान में उत्तर बंगाल संगठनात्मक संभाग के संयोजक हैं। पार्टी के भीतर उन्हें मजबूत संगठनकर्ता माना जाता है।
उनके छोटे भाई बिराज बोस भी भाजपा संगठन से जुड़े हैं और कूचबिहार जिले में पार्टी के जिला उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने कूचबिहार और उत्तर बंगाल को बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। इससे पहले दिनहाटा से विधायक निशीथ प्रमाणिक को राज्य मंत्रिमंडल में जगह दी गई थी, और अब स्पीकर पद पर रथिंद्र बोस की नियुक्ति को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
आमतौर पर विधानसभा स्पीकर का पद अनुभवी विधायकों को दिया जाता है, लेकिन इस बार पार्टी ने परंपरा से हटकर पहली बार विधायक बने रथिंद्र बोस पर भरोसा जताया है। उनके चयन को संगठनात्मक अनुभव और शैक्षणिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जा रहा है। अब सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने की बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर होगी।
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