यौन अपराध मामलों में जजों को SC की सलाह, पीड़ितों के लिए संवेदनशील शब्दों के इस्तेमाल का निर्देश

HIGHLIGHTS
- रिपोर्ट में 125 ट्रायल कोर्ट फैसलों के विश्लेषण के बाद कई सुझाव दिए गए हैं।
- समिति ने कहा कि देरी से शिकायत या चोट न होने को सहमति का आधार नहीं माना जाना चाहिए।
- जजों को पीड़ितों से जुड़े मामलों में सम्मानजनक व्यवहार और अनावश्यक सवालों से बचने की सलाह दी गई है।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसले लिखते समय अधिक संवेदनशीलता बरतने और पीड़ित केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायाधीशों को प्रोसिक्यूट्रिक्स (शिकायतकर्ता महिला), बेबस महिला, पवित्रता खो दी और लज्जा भंग जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए। इसके स्थान पर अदालतों को पीड़ित, सर्वाइवर, शिकायतकर्ता, बॉडीली ऑटोनॉमी (शरीर पर अपना अधिकार) और सेक्सुअल असॉल्ट (यौन हमला) जैसे तटस्थ शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। यह सुझाव सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट में दिया गया है।
125 फैसलों के विश्लेषण के बाद तैयार हुई रिपोर्ट
जजमेंट्स एंड जेंडर: सेंसिटिविटी एंड कम्पैशन इन राइटिंग जजमेंट्स नाम से तैयार की गई यह रिपोर्ट देशभर की ट्रायल कोर्ट के 125 फैसलों के विश्लेषण के बाद बनाई गई है। इसके लिए राज्य न्यायिक अकादमियों की भी मदद ली गई।
रिपोर्ट में बताया गया कि पीड़ितों, गवाहों और अन्य कमजोर वर्गों के साथ न्यायाधीशों के व्यवहार में अलग-अलग स्थिति देखने को मिली। समिति ने कहा कि निष्पक्षता, सम्मान और तटस्थता बनाए रखने के लिए न्यायिक भाषा में संवेदनशीलता जरूरी है।
पीड़ित को दोषी ठहराने वाले सवालों से बचने की सलाह
समिति ने कहा कि जजों को रूढ़िवादी सोच या पीड़ित को जिम्मेदार ठहराने वाले सवालों से बचना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि पीड़ितों को आरोपी के साथ बातचीत करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में चिंता जताई गई कि बेहोश महिलाओं से जुड़े यौन उत्पीड़न मामलों में न्यायिक भाषा कई बार बलात्कार से जुड़े मिथकों को बढ़ावा दे सकती है। इसमें आरोपी के व्यवहार पर ध्यान देने के बजाय पीड़ित की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया गया।
फैसलों में इस्तेमाल होने वाले शब्दों में बदलाव का सुझाव
रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ शब्द और वाक्यांश पीड़ितों को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकते हैं और सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं। समिति ने अदालतों में स्पष्ट नीतियां, आसानी से उपलब्ध सहायता व्यवस्था, जागरूकता अभियान और लिंग आधारित व नैतिक टिप्पणियों पर रोक लगाने की सिफारिश की है।
समिति ने फैसलों में इस्तेमाल होने वाले कुछ सामान्य वाक्यांशों को बदलने का सुझाव दिया है। इसमें महिलाओं के शरीर को खेल का मैदान बताने जैसे शब्दों की जगह शिकायतकर्ता या पीड़ित की शारीरिक स्वायत्तता के उल्लंघन जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है।
इसी तरह पीड़ित बनाना या आत्मा का विनाश जैसे शब्दों की जगह सर्वाइवर को नुकसान या ट्रॉमा का अनुभव हुआ जैसे शब्दों के प्रयोग का सुझाव दिया गया है।
इन शब्दों के इस्तेमाल से भी बचने की सलाह
रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालतों को बेचारी बेबस नाबालिग लड़की, आरोपी की हवस, अपनी नाजायज हवस पूरी करना, बचपन बर्बाद करना, जिंदगी तबाह करना और पूरी जिंदगी परेशान करना जैसे वाक्यांशों से बचना चाहिए।
समिति ने कहा कि सम्मान, शर्म, पवित्रता, संकोच और शुद्धता जैसे शब्द पितृसत्तात्मक सोच से जुड़े हैं, जो महिला के मूल्य को उसकी यौन पवित्रता या पारिवारिक प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं। इसके बजाय न्यायिक तर्क का आधार सहमति, गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकार होने चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यौन हमले को केवल हवस के रूप में बताने से पुरुषों की यौन इच्छा को अनियंत्रित बताने की धारणा बन सकती है और अपराध की गंभीरता कम हो सकती है। इसलिए अदालतों को यौन हमला, यौन हिंसा या अपराध जैसे कानूनी रूप से सटीक शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए।
देरी से रिपोर्ट या चोट न होने को सहमति न मानें
समिति ने जजों को चेतावनी दी कि घटना की देर से रिपोर्ट, चोट न होने या शारीरिक विरोध नहीं करने के आधार पर कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया कि चोट का न होना, शिकायत दर्ज कराने में देरी या विरोध न करना सहमति का संकेत नहीं होता। पीड़ित अलग-अलग तरीकों से सदमे पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इसलिए अदालतों को पीड़ित के व्यवहार को लेकर बनी धारणाओं के आधार पर कोई नकारात्मक निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए।
जजों को दिए गए ये निर्देश
रिपोर्ट में ट्रायल जजों से कहा गया है कि वे अपमानजनक या अनावश्यक जिरह को रोकें, खासकर सर्वाइवर के यौन इतिहास से जुड़े सवालों को।
समिति ने कहा कि जजों को सामान्य शिष्टाचार का ध्यान रखना चाहिए, जिसमें सर्वाइवर को बैठने के लिए कुर्सी और पानी उपलब्ध कराना, गवाही के दौरान कोर्टरूम से गैर-जरूरी लोगों को हटाना और उनकी बातों के साथ-साथ बॉडी लैंग्वेज पर भी ध्यान देना शामिल है।
रिपोर्ट में कहा गया कि जब पीड़ितों से शर्मनाक, डराने वाले या गैर-जरूरी सवाल पूछे जाएं, जिनमें अपराध से पहले उनके कपड़ों या व्यवहार से जुड़े सवाल भी शामिल हों, तो अदालतों को मूक दर्शक नहीं बने रहना चाहिए।
समिति ने कहा कि किसी सभ्य समाज में किसी महिला को केवल उसके कपड़ों के आधार पर आंकना या उसके चरित्र और शालीनता पर टिप्पणी करना स्वीकार्य नहीं है। पीड़ितों के लिए ट्रायल से पहले काउंसलिंग, बंद कमरे में सुनवाई, गवाह सुरक्षा और कानूनी सहायता जैसी व्यवस्थाओं की भी सिफारिश की गई है।
संवेदनशील मामलों को लेकर बनाई गई थी समिति
समिति ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों को पीड़ितों या संवेदनशील गवाहों की ओर से सुरक्षा की मांग का इंतजार नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना कानूनी जिम्मेदारी है।
यह समिति 10 फरवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बनाई गई थी। उस फैसले में यौन अपराधों और कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले जजों में संवेदनशीलता और सहानुभूति बढ़ाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा गया था।
यह मामला तब सामने आया था जब सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित आदेश का स्वत: संज्ञान लिया था। हाई कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना और उसके पजामे का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश नहीं माना जाएगा।
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