देश की राजनीति इस समय सड़क से ज्यादा सोशल मीडिया पर गर्म नजर आ रही है। वजह है UGC का नया नियम – Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 – जिसने जाति, आरक्षण और समानता को लेकर बहस को फिर से तेज कर दिया है। इस बार केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक माने जाने वाले सवर्ण वर्ग के कुछ लोग भी इस विषय पर चिंता जता रहे हैं।

सवर्ण वर्ग को कोई नुकसान नहीं:
इस विवाद के बीच गोड्डा के बीजेपी सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने साफ संदेश दिया कि मोदी सरकार के रहते सवर्ण जाति के बच्चों के साथ कोई अन्याय नहीं होगा। उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस का केंद्र बना दिया है।

नए नियमों का दायरा:
UGC के 15 जनवरी 2026 से लागू हुए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना है। पहले यह प्रावधान केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) तक सीमित थे, लेकिन अब इसे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक बढ़ा दिया गया है। इसका मतलब यह है कि यदि किसी OBC छात्र, प्रोफेसर या कर्मचारी को जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो वह औपचारिक शिकायत दर्ज करा सकता है।

संस्थागत जवाबदेही बढ़ी:
हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में Equal Opportunity Cell (समान अवसर प्रकोष्ठ) बनाना अनिवार्य होगा। साथ ही, महिला, दिव्यांग, SC, ST और OBC वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए Equity Committee गठित होगी। यह समिति हर छह महीने में रिपोर्ट तैयार कर सीधे UGC को भेजेगी। इससे संस्थानों की जवाबदेही पहले से कहीं अधिक कड़ी हो जाएगी।

राजनीतिक बहस का केंद्र:
सोशल मीडिया पर कुछ समूह इसे संस्थागत संतुलन में बदलाव के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि समर्थक इसे केवल भेदभाव रोकने के प्रशासनिक उपाय के रूप में बता रहे हैं।

निशिकांत दुबे का संदेश:
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने 24 जनवरी को X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा कि यह कानून किसी भी जाति या वर्ग के खिलाफ नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10% EWS आरक्षण लागू किया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी मंजूरी दी। दुबे ने संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए कहा कि समानता का अधिकार अटूट है और इसमें कोई छेड़छाड़ नहीं हो सकती।

उनका संदेश साफ था – सरकार संतुलन बिगाड़ने नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधारने आई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आश्वासन सोशल मीडिया पर फैली चिंता को ठंडा कर पाएगा। फिलहाल, UGC के नए नियम शिक्षा नीति को सीधे राजनीतिक बहस का केंद्र बना चुके हैं, जहां कानून से ज्यादा भावनाएं और धारणाएं टकरा रही हैं।