प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित यूजीसी बिल को लेकर बिहार की राजनीति में उबाल आ गया है। राज्य के कई हिस्सों में भाजपा के परंपरागत समर्थक माने जाने वाले सवर्ण समाज के युवाओं ने सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराया। पटना, भागलपुर, पूर्णिया, मुजफ्फरपुर सहित कई जिलों में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। सोमवार को पटना के बाढ़ अनुमंडल में हालात तब और गर्म हो गए, जब भाजपा के ही कुछ कार्यकर्ता अपनी सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते नजर आए और पार्टी छोड़ने तक की बात कह दी।
इस माहौल का असर राजधानी स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में भी साफ दिखा। मंगलवार को कार्यालय में सन्नाटा पसरा रहा। जब पत्रकारों ने यूजीसी बिल पर पार्टी नेताओं से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की तो अधिकतर ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। एक प्रवक्ता ने यहां तक कह दिया कि इस विषय पर दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व से बात की जाए, क्योंकि स्थानीय नेताओं को बयान देने से रोका गया है। भाजपा प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने केवल इतना कहा कि बिल सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है और किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।
जदयू ने जताई आपत्ति
यूजीसी बिल को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने अलग रुख अपनाया है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने कहा कि किसी भी कानून से समाज के किसी वर्ग की अनदेखी लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि कई राज्यों में भाजपा से जुड़े पदाधिकारी इन नए नियमों के विरोध में अपने पदों से इस्तीफा दे चुके हैं। उनका कहना है कि नए प्रावधानों में सजा से जुड़े नियम हटने से दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है और सामान्य वर्ग के छात्र व शिक्षक गलत तरीके से निशाना बनाए जा सकते हैं।
पटना में छात्रों का प्रदर्शन
पटना के दिनकर गोलंबर पर बड़ी संख्या में छात्र जुटे और यूजीसी बिल के खिलाफ नारे लगाए। छात्र नेता सौरव कुमार, विशाल और राकेश कुमार ने आरोप लगाया कि यह कानून समाज को बांटने वाला है और खास तौर पर सवर्ण वर्ग के खिलाफ है। उनका कहना था कि सरकार वोट बैंक की राजनीति के लिए एक वर्ग की अनदेखी कर रही है। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से इस कानून को वापस लेने की मांग की।
क्या है यूजीसी का नया नियम
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 से ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ लागू किया है, जिसे आम तौर पर इक्विटी बिल कहा जा रहा है। यह 2012 के पुराने नियमों की जगह लेगा। आयोग के मुताबिक, इसका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना है। इसके तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में ‘इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर’ बनाया जाएगा, जो शिकायतों की सुनवाई करेगा और जरूरतमंद छात्रों को सहायता देगा। सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था से सभी विद्यार्थियों को समान अवसर सुनिश्चित होंगे।