नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। बीते छह महीनों के भीतर विश्वविद्यालय स्तर पर दूसरी बार फीस बढ़ाए जाने से छात्रों के साथ-साथ कॉलेज प्रबंधन की भी चिंताएं बढ़ गई हैं। संस्थागत सुविधाओं से जुड़ी नई दरें शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होंगी। इसके साथ ही पिछले चार वर्षों में केंद्र स्तर पर वसूली जाने वाली यूनिवर्सिटी फीस में कुल मिलाकर लगभग 156 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है।
ताजा संशोधन के बाद कुल फीस में दिल्ली विश्वविद्यालय का हिस्सा बढ़कर 4,100 रुपये हो गया है, जो जुलाई 2025 में तय की गई 3,500 रुपये की राशि से करीब 17 प्रतिशत अधिक है। यह बढ़ोतरी उस नीति से भी ज्यादा बताई जा रही है, जिसमें महंगाई के मद्देनजर हर साल लगभग 10 प्रतिशत वृद्धि की बात कही गई थी। उल्लेखनीय है कि 2022 के बाद से अब तक ऐसा कोई शैक्षणिक वर्ष नहीं रहा, जब फीस में इजाफा न हुआ हो।
कॉलेज प्रशासन का कहना है कि फीस में लगातार और तेज़ी से हो रही बढ़ोतरी चिंता का कारण है। सार्वजनिक विश्वविद्यालय होने के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय में अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्र पढ़ते हैं। ऐसे में बार-बार फीस बढ़ना उच्च शिक्षा को धीरे-धीरे महंगा बनाता जा रहा है। इसके अलावा, यूनिवर्सिटी स्तर की फीस के साथ-साथ कॉलेज स्तर पर भी अलग से शुल्क लिया जाता है, जिससे प्रति सेमेस्टर छात्रों पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है।
आंकड़ों के अनुसार, यूनिवर्सिटी डेवलपमेंट फंड 2022 में 900 रुपये था, जो 2026 तक बढ़कर 1,750 रुपये हो गया है। इसी तरह सुविधाओं और सेवाओं से जुड़ी फीस 500 रुपये से बढ़कर 1,750 रुपये तक पहुंच गई है। वहीं, ईडब्ल्यूएस वेलफेयर फंड भी चार साल में 100 रुपये से बढ़कर 300 रुपये कर दिया गया है। इन सभी बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों पर पड़ रहा है, जहां कुल फीस का भार अधिक है।
कॉलेज प्राचार्यों का मानना है कि भले ही निजी या विदेशी विश्वविद्यालयों की तुलना में दिल्ली विश्वविद्यालय की फीस अभी कम प्रतीत होती हो, लेकिन एक सार्वजनिक संस्थान में इस तरह की निरंतर बढ़ोतरी गंभीर संकेत है। उनका कहना है कि यदि फीस संरचना पर दोबारा विचार नहीं किया गया, तो इसका असर छात्रों की शिक्षा तक पहुंच, नामांकन दर और उच्च शिक्षा की समावेशिता पर साफ तौर पर दिखाई देगा।