धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव सामने आया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के हालिया निर्देशों के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस स्थल को लेकर नई व्यवस्था जारी की है। नए आदेश में एएसआई ने पहली बार इस परिसर को “राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला” के रूप में उल्लेखित किया है।

इससे पहले प्रशासनिक रिकॉर्ड में इस स्थल के संदर्भ को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही थीं, जिनमें “कमाल मौला मस्जिद” जैसे उल्लेख भी शामिल थे। हालांकि नए आदेश के बाद इन संदर्भों को लेकर स्थिति बदलती नजर आ रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।

हिंदू पक्ष और विभिन्न संगठनों ने इस निर्णय को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए इसे लंबे समय से चली आ रही परंपरा की पुष्टि बताया है। उनका कहना है कि इससे स्थल के मूल स्वरूप को लेकर स्पष्टता बढ़ी है।

याचिकाकर्ता आशीष गोयल के अनुसार, उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में भोजशाला की ऐतिहासिक पहचान और वहां वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा को ध्यान में रखा है। इसके बाद एएसआई की नई व्यवस्था में वर्षभर पूजा-अर्चना की अनुमति से जुड़ा प्रावधान भी सामने आया है, जबकि पूर्व की कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव की बात कही जा रही है।

पुरानी व्यवस्था का संदर्भ

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2003 से लागू व्यवस्था के तहत इस स्थल पर सह-अस्तित्व का मॉडल अपनाया गया था, जिसमें मंगलवार को हिंदू पूजा और शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी, जबकि बाकी दिन इसे सामान्य आगंतुकों के लिए खोला जाता था।

नए आदेश के बाद इस व्यवस्था में बदलाव को लेकर विभिन्न पक्षों में चर्चा तेज हो गई है। धार सहित पूरे मध्य प्रदेश में इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों की राय

कानूनी और पुरातात्विक विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला है। उनका कहना है कि भोजशाला स्थल लंबे समय से परमार वंश के राजा भोज की विद्या परंपरा और सरस्वती उपासना से जुड़ा माना जाता रहा है, जिस पर यह नया प्रशासनिक दृष्टिकोण नई बहस को जन्म दे सकता है।