शिवसेना (यूबीटी) के नेता आदित्य ठाकरे ने पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रहे राजनीतिक घमासान के बीच बागी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पार्टी छोड़ने या उसके खिलाफ मोर्चा खोलने वाले नेताओं को “डरपोक” और “कृतघ्न” करार दिया।
आदित्य ठाकरे ने कहा कि जिन लोगों ने कभी पार्टी और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लाभ लिया, वही अब संगठन से दूरी बना रहे हैं और उसकी आलोचना कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे नेता पार्टी के योगदान और नेतृत्व को नजरअंदाज कर रहे हैं।
गौरतलब है कि 2022 में महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए राजनीतिक विद्रोह के बाद शिवसेना पहले ही विभाजन का सामना कर चुकी है। इसी संदर्भ का जिक्र करते हुए ठाकरे ने टीएमसी में चल रही मौजूदा अंदरूनी खींचतान पर भी टिप्पणी की।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया है। पार्टी के कई सांसदों और विधायकों ने नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों पर सवाल उठाए हैं, खासकर महासचिव अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर असहमति बढ़ी है।
हाल ही में लोकसभा में टीएमसी के 20 सांसदों के एक समूह ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर खुद को एक अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग की, जिससे पार्टी में विभाजन की स्थिति और स्पष्ट हो गई। इसके अलावा, कुछ राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे की भी खबरें सामने आई हैं।
विधानसभा में भी हालात तनावपूर्ण रहे, जहां पार्टी के 80 में से 58 विधायकों के एक हिस्से ने नेतृत्व से अलग रुख अपनाते हुए पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के बजाय निष्कासित विधायक ऋतब्रता बनर्जी का समर्थन किया। इससे टीएमसी के अंदर गहरी दरारें उजागर हुई हैं।
इसी पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए आदित्य ठाकरे ने कहा कि यह स्थिति पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और नेतृत्व संकट को दर्शाती है।
उन्होंने आगे कहा, “जो लोग डरपोक और कृतघ्न हैं, जो पार्टी और ममता दीदी के योगदान को नहीं समझते, वे अब संगठन छोड़ रहे हैं।”
कल्याण बनर्जी द्वारा अभिषेक बनर्जी की नेतृत्व शैली पर सवाल उठाने और ममता बनर्जी को लेकर दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ठाकरे ने कहा कि यह घटनाक्रम राजनीतिक अस्थिरता को दर्शाता है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर उनकी पार्टी (अविभाजित शिवसेना) को समय पर न्याय मिला होता, तो स्थिति इस स्तर तक नहीं पहुंचती। उनका कहना था कि यह मामला केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक महत्व का भी है।