मुंबई। ऑटोरिक्शा चालकों और महाराष्ट्र सरकार के बीच मराठी भाषा की अनिवार्यता को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। राज्य सरकार के एक प्रस्ताव को लेकर चालक संगठनों और यूनियनों में नाराजगी गहराती जा रही है। प्रस्ताव में सार्वजनिक परिवहन से जुड़े चालकों के लिए मराठी भाषा की बुनियादी समझ को अनिवार्य करने की बात कही गई है।
इसी मुद्दे को लेकर सोमवार को गोरेगांव पश्चिम में ऑटोरिक्शा यूनियनों की एक अहम बैठक आयोजित की जा रही है। इस बैठक में बड़ी संख्या में चालक और वाहन मालिक शामिल हो सकते हैं। माना जा रहा है कि बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा होगी।
सेवाओं पर असर की आशंका
यूनियनों के कड़े रुख के चलते मुंबई के कई उपनगरों में ऑटोरिक्शा सेवाओं पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो 4 मई से पूरे मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) में बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।
यूनियनों की आपत्ति और प्रस्ताव
मुंबई ऑटोरिक्शा यूनियन के नेता शशांक राव ने बताया कि बैठक में यह तय किया जाएगा कि सरकार के उस प्रस्ताव का विरोध किस तरह किया जाए, जिसमें मराठी न जानने वाले चालकों के लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान शामिल है। यूनियन की ओर से ड्राइवरों से बैठक में अधिक संख्या में भाग लेने की अपील भी की गई है।
यह विवाद ऐसे समय में बढ़ा है जब यूनियन प्रतिनिधिमंडल की मंगलवार को राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के साथ बैठक प्रस्तावित है। मंत्री ने पहले ही संकेत दिए हैं कि सार्वजनिक परिवहन चालकों को मराठी की बुनियादी समझ होना जरूरी होगा, अन्यथा उनके लाइसेंस और परमिट पर असर पड़ सकता है।
सरकार का रुख और प्रशिक्षण का आश्वासन
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाते हुए कहा है कि सरकार उन चालकों को भाषा प्रशिक्षण उपलब्ध कराएगी, जिन्हें मराठी नहीं आती। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी भाषा को मजबूरी के तौर पर थोपा नहीं जाना चाहिए।
परिवहन विभाग ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत कुछ नियमों में संशोधन का मसौदा तैयार किया है। प्रस्तावित बदलावों में नियम 4, 78 और 85 शामिल हैं, जिनके तहत लाइसेंस, परमिट और उनके नवीनीकरण के लिए मराठी की प्राथमिक जानकारी को अनिवार्य किया जा सकता है। यह नियम विशेष रूप से ऑटोरिक्शा और टैक्सी चालकों पर लागू होंगे।