मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि संघ किसी के विरोध में नहीं है और न ही उसे सत्ता या लोकप्रियता की इच्छा है।

भागवत ने जनसभा को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन के समय उभरी विभिन्न विचारधाराओं का जिक्र किया और बताया कि राजा राम मोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारकों ने देश को दिशा देने में योगदान दिया। उन्होंने कहा कि आज भी समाज को मार्गदर्शन देने और अनुकूल माहौल बनाने का कार्य पर्याप्त रूप से नहीं हो रहा है।

संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि आरएसएस किसी घटना की प्रतिक्रिया में काम नहीं करता, बल्कि देश में चल रहे सकारात्मक प्रयासों को सशक्त बनाने और उन्हें समर्थन देने का काम करता है। उन्होंने कहा कि संघ कोई अर्धसैनिक बल नहीं है, भले ही इसके स्वयंसेवक नियमित पथ संचलन करते हों और प्रशिक्षण के दौरान लाठी चलाते हों। संघ को किसी अखाड़े या सैन्य संगठन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

भागवत ने यह भी बताया कि संघ सीधे राजनीति में शामिल नहीं है, हालांकि इसके कुछ स्वयंसेवक राजनीतिक जीवन में सक्रिय हैं। उन्होंने 1925 में संघ की स्थापना से पहले की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए बताया कि अंग्रेजों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को “सुरक्षा वाल्व” के रूप में स्थापित किया, लेकिन भारतीयों ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का शक्तिशाली साधन बनाया।

संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि हेडगेवार ने 13 वर्ष की उम्र में प्लेग से माता-पिता खो दिए और आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया। इसके बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभाई, जिसमें उनके स्कूल के दिनों का वंदे मातरम् आंदोलन शामिल था।

भागवत ने हेडगेवार के जीवन की एक घटना का भी जिक्र किया, जब उन्हें ‘कोकेन’ नामक कोडनेम से काम करने के दौरान पुलिस ने गलतफहमी में हिरासत में ले लिया। यह घटना रास बिहारी बोस की किताब में दर्ज है।