सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तराखंड में रेलवे परियोजना के लिए जरूरी सरकारी जमीन पर रहने वाले परिवारों के पुनर्वास के लिए विशेष शिविर आयोजित करने का आदेश दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत प्रभावित परिवार इस शिविर में आवेदन कर सकेंगे।

याचिकाकर्ताओं के अनुरोध पर कोर्ट ने कहा कि शिविर रमजान के बाद, यानी 15 मार्च के बाद आयोजित किया जाए। नैनीताल के जिला कलेक्टर और अन्य राजस्व अधिकारियों को प्रक्रिया में पूरी सहायता देने का आदेश भी दिया गया। कोर्ट ने कहा कि यह कार्य 31 मार्च से पहले पूरा किया जाना चाहिए।

पीछे का मामला
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची, दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हल्द्वानी में लगभग 50,000 लोगों को सार्वजनिक जमीन से हटाने का निर्देश दिया गया था। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी। जुलाई और सितंबर 2024 में कोर्ट ने राज्य, केंद्र और रेलवे को निर्देश दिया कि सार्वजनिक जमीन से हटाए गए लोगों के लिए पुनर्वास योजना बनाई जाए।

कोर्ट का निर्देश और पुनर्वास प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिक्रमण करने वालों का यह हक नहीं कि वे उसी जमीन पर रहने की मांग करें या रेलवे के फैसले में हस्तक्षेप करें। रेलवे की लगभग 30 हेक्टेयर जमीन में बनभूलपुरा, गफूर बस्ती और अन्य इलाकों में हजारों अवैध निर्माण हैं, जिनमें अनुमानित 5,000 परिवार (करीब 50,000 लोग) रहते हैं।

कोर्ट ने कहा कि प्रभावित परिवारों की सूची तैयार की जाए और विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लोग पीएमएवाई के तहत आवास के लिए आवेदन कर सकें। नैनीताल जिले की रेवेन्यू अथॉरिटी, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर 19 मार्च से एक सप्ताह का शिविर आयोजित करेंगे, जहां हर परिवार का मुखिया जाकर फॉर्म भर सके। बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाया जाएगा, और जिलाधिकारी और एसडीएम हल्द्वानी को लॉजिस्टिक सहायता देने का आदेश भी दिया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर लोगों को पीएमएवाई के बारे में जागरूक करने को कहा गया।

रेलवे का पक्ष
रेलवे ने कहा कि ट्रैक विस्तार और अन्य परियोजनाओं के लिए यह जमीन आवश्यक है, क्योंकि नदी के कारण मौजूदा ट्रैक में दिक्कत आ रही है। यह उत्तराखंड में रेलवे विस्तार के लिए आखिरी उपयुक्त जगह है, इसके बाद पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है।

याचिकाकर्ताओं की दलील
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि यहां करीब 50,000 लोग दशकों से रह रहे हैं, कई लोग पट्टेदार जमीन पर हैं और रेलवे ने पहले कभी इस पर मांग नहीं की। भूषण ने पास की खाली जमीन के उपयोग का सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि इतने परिवारों को पीएमएवाई के तहत एक साथ आवास देना चुनौतीपूर्ण है।

सरकारी पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपए भत्ता दिया जाएगा। रेलवे और राज्य सरकार ने प्रभावित परिवारों की पहचान और पुनर्वास सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया।

मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी, और तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। केंद्र ने बताया कि 13 जमीनों पर फ्रीहोल्ड है और हर्जाना राज्य और रेलवे दोनों द्वारा दिया जाएगा।