राजनीतिक दलों के नेता तो जातिवाद का सहारा लेकर सत्ता या कुर्सी हथियाने में तत्पर रहते ही हैं लेकिन अब बिजली विभाग में भी जाति बिरादरी का खेल शुरु होना दुर्भाग्यपूर्ण है जिसका दुष्परिणाम जनता या उपभोक्ताओं को भोगना पड़ेगा।
गत वर्ष पश्चिमांचल विद्युत निगम की महिला एम.डी. ने लाइन लॉस (बिजली चोरी), विद्युत बिलों की कम रिकवरी तथा विभागीय कार्यों के प्रति उदासीनता एवं अनुशासनहीनता के आधार पर विभागीय अधिकारियों के विरुद्ध कुछ दण्डात्मक कार्यवाही की थी। इस पर पावर ऑफिसर्स एसोसिएशन के नेताओं ने एम.डी. पर जातिवादी होने का आरोप लगाकर विरोध का झण्डा उठा लिया। कहा गया कि दलित अभियंताओं को पीड़ित किया जाता है। दबाव में आकर इनके विरुद्ध अनुशासनहीनता एवं अन्य शिकायतों के मामले वापिस ले लिए गये और भ्रष्टाचार, बिजली चोरी कराने वाले दोषी अभियंता बच गए।
कुछ विशेष लोग ऊर्जा मंत्री ए.के शर्मा एवं पॉवर कॉरपोरेशन के चेयरमैन तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर दबाव बनाये रखने के मकसद से दलित अभियंताओं को संगठित करने में जुटे हैं। ये चाहते हैं कि दलित व पिछड़ों की एकता का खौफ दिखाकर भ्रष्टाचार की गंगोत्री में सदा गोते मारते रहें। सरकारी विभागों, निगमों में जाति आधारित एसोसिएशन या संगठन बनाना सरासर अनुचित एवं जन विरोधी तथा राजकीय नियमों के विरुद्ध है। यदि भ्रष्टाचार करोगे, चोरी करवाओगे, हुक्म उदूली करोगे तो उच्च अधिकारी एक्शन तो लेंगे ही। इसमें दलित या गैरदलित का सवाल कहाँ से आ गया।
अभी 1 मार्च को लखनऊ के कल्याणनगर विद्युत उपकेन्द्र पर तैनात संविदाकर्मी परशुराम की इस लिए मौत हो गई कि मरम्मत के दौरान लाइन चालू कर दी गई। मध्यांचल विद्युत निगम की एम.डी. रिया केजरीवाल ने अधिशासी अभियन्ता, उपमण्डलीय अधिकारी, अवर अभियन्ता, सभी को निलंबित कर दिया। इनमें कौन दलित है, कौन गैरदलित यह नहीं देखा। सरकारी कामकाज दलित पिछड़ा एवं सवर्ण-गैर सवर्ण के आधार पर नहीं चलाया जा सकता, न ही यूनियनों को जाति आधारित बनाया जाना चाहिए। ऐसा करने वालों को रोका जाना चाहिए।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'