डॉ. भीमराव आम्बेडकर की 135वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने, उनका महिमामंडन गुणगान करने और उनकी याद में बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाने वाले सभी महानुभाव एवं संस्थाएं प्रशंसा की पात्र हैं।
भारत में दिखावा और असलियत के बीच गहरी खाई बनी रहती है। क्या कथनी और करनी का अन्तर हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है? एक ओर प्रतिमा पर फूल चढ़ाये जाते है, दूसरी ओर मूर्ति खंडित की जाती है।
जो डा. आम्बेडकर का नित्यप्रति गुणगान करते हैं, उनके नाम की माला जप कर राजनीति की दुकान चलाते हैं, वोटों और नोटों के अंबार खड़े करते हैं, दिल पर हाथ रखकर सोचें कि क्या वे डॉ. आम्बेडकर के विचारों एवं सिद्धांतों, नियमों व आचरण का पालन कर रहे हैं?
डॉ. आम्बेडकर ने सदियों की असमानता, उलझावपूर्ण सामाजिक ताना-बाना नष्ट कर भारत को विश्व का उन्नत समृद्धशाली देश बनाने का प्रयास किया। बदले में उनके साथ क्या किया गया? उनकी आदम कद मूर्तियां बना कर दफ्तरों और ड्राइंग रूम में उनके फोटो टांग कर आप उस पर पर्दा नहीं डाल सकते।
जिसने सदियों से चले आ रहे अंधविश्वासों, पाखंड, भेदभाव पर सीधा प्रहार कर सर्वसमाज को सामर्थ्यवान, बलवान बनाने का प्रयास किया, उसकी पत्थर की मूर्ति बना अपने-अपने ढंग के हथकंडे अपना कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है।
यह दुखदायी स्थिति है कि डॉ. आम्बेडकर को सब अपने-अपने ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं। कह दिया जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। डॉ. आम्बेडकर को सामाजिक परिवर्तन का आदर्श बनाने के बजाय सत्ता हथियाने का फार्मूला बना डाला! ऐसों पर धिक्कार है।
डॉ. आम्बेडकर मात्र संविधान निर्माता नहीं, पुरातन भारतीय परम्परा के अनुसार एक क्रान्तिदर्शी ऋषि थे, स्वार्थी तत्वों ने उन्हें बदरंग करने का ओछा कुप्रयास किया। भारतीय परम्परा में कहीं फादर ऑफ द नेशन की थ्योरी नहीं है। यह पश्चिम व कांग्रेस की परंपरा है, जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता बना दिया। गांधी जी के प्रति पूरे आदर के साथ हम कहना चाहेंगे कि भारत माता के सपूत तो अनेक हो सकते हैं किन्तु कोई राष्ट्र का पिता नहीं हो सकता। महापुरुषों के बीच तुलना नहीं हो सकती। सबका अपना-अपना स्थान है। फिर भी यदि तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो डॉ. आम्बेडकर का पलड़ा भारी दिखाई पड़ता है।
यदि परमाणु युद्ध में दुनिया नष्ट न हुई तो, अब न सही, एक दिन डॉ. भीमराव आम्बेडकर को फादर ऑफ द नेशन कहा जाएगा। किसी कौम का उन पर एकाधिकार नहीं। उन्हें रूढ़ियों में नहीं बांधा जा सकता। आम्बेडकर एक विचार है- पूरी दुनिया के दलितों-पिछड़ों के लिए शाश्वत सन्देश। उन्हें बुतपरस्ती में जकड़ कर नहीं रखा जा सकता?
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'