नोट: यह लेख उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर पर पाबंदी लगाने से पूर्व लिखा गया था।
बिजली को लेकर उपभोक्ता और विभाग की अपनी-अपनी समस्यायें है। उपभोक्ताओं का कहना है कि विद्युत विभाग के अधिकारी-कर्मचारी गलत बिल भेजते हैं। बिल ठीक कराने के नाम पर सुविधा शुल्क लेते हैं। इस्टीमेट और नया कनेक्शन देने में भष्टाचार होता है, अचानक अघोषित कटौती आम है। विभाग में भ्रष्टाचार, लापरवाही तथा अनियमितताओं के चलते अधीक्षण अभियंता से अवर अभियंताओं का निलंबन यह दर्शाता है कि विभाग में सब ठीकठाक नहीं है।
दूसरी ओर विद्युत विभाग लाइन लॉस (बिजली चोरी), उपभोक्ताओं द्वारा बिल जमा न करने की प्रवृति से परेशान है। कनेक्शन कटने के बाद भी बिलों का भुगतान नहीं किया जाता। मुजफ्फरनगर में नादेहंद उपभोक्ताओं की संख्या हजारों में है तो पूरे उत्तर प्रदेश में कितनी होगी? अरबों रुपया बकाया होने से राज्य विद्युत परिषद् की हालत खस्ता है।
बिजली विभाग के अधिकारी/ कर्मचारी रोज-रोज के धरना प्रदर्शनों से आजिज़ आ चुके हैं। किसान यूनियन के नेता लीडरी चमकाने के लिए मीटर उखाड़ने का ही नहीं, खेतों में लगे बिजली के खम्बों को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हैं। बिजलीघरों के कर्मचारियों को बंधक बना कर धूप में बैठा दिया जाता है।
बिजली चोरी का यह आलम है कि कुछ उपभोक्ता धड़ल्ले से कट लगाकर, कटिया डाल कर बिजली चुराते हैं। गत 29 अप्रैल को मुजफ्फरनगर की इंदिरा कॉलोनी में विकास नामक उपभोक्ता को केबिल में कट लगा कर बिजली चोरी करते पकड़ा गया। गांधी कॉलोनी में कुछ उपभोक्ताओं के मीटर टेम्पर्ड पाये गए। बिजली चोरी का यह छोटा सा उदाहरण मात्र है। शहर के कुछ ऐसे मोहल्ले हैं, जहां रीडिंग लेने जाने का साहस जुटाना हर मीटर रीडर के बूते से बाहर है। यहां जम कर बिजली चोरी होती है।
देखा जाए तो बिजली विभाग समस्याओं का विभाग है। स्मार्ट मीटरों ने एक नया ही विवाद पैदा कर दिया है। कुछ लोगों ने भ्रम फैला दिया है कि ये मीटर तेजी से चलते हैं और वास्तविक उपयोग से 3-4 गुणा बढ़ कर बिल आता है। मीटर गलत हैं तो जांच कराके आपूर्ति करने वाली फर्म को दंडित क्यों नहीं किया गया?
इस तथ्य को सरकार या विद्युत परिषद क्यों सार्वजनिक नहीं करती कि स्मार्ट मीटर बिजली चोरी रोकने और समय पर भुगतान लेने का सक्षम साधन है! इनके विरोध का यह प्रमुख कारण है। एक और बिजली चोरी में बाधा तो दूसरी ओर राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त में बिजली देने की घोषणाओं ने उपभोक्ताओं को मुफ्तखोरी का चस्का लगा दिया है। बिजली का बिल आते ही वे सोचते हैं कि रंगदारी वसूलने का परवाना आ गया है।
उपभोक्ताओं की इस मनोदशा का लाभ उठाने के लिए कुछ विशेष राजनीतिक दल सक्रिय हो गए हैं। अपना हित साधने को उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में महिलाओं के जरिये हिंसा, आतंक फैलाने की साजिश रची है। स्मार्ट मीटर के विरोध की आड़ में इन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में बवाल मचाने में कसर नहीं छोड़ी। पहली अप्रैल को महिलाओं को लाठी-डंडे, लोहे के रॉड लेकर मैदान में उतारा गया जिन्होंने बिजलीघरों में घुस कर तोड़ फोड़ की, कर्मचारियों पर प्रहार किये, घरों के मीटर उखाड़ कर सड़क पर या बिजलीघरों में फेंक दिये। जमकर पत्थरबाजी की गई। अलीगढ़, फिरोजाबाद, कानपुर, गाजियाबाद, हाथरस, गोविन्दपुरी (मोदीनगर) आदि सैकड़ों स्थानों में प्रशिक्षित दंगाइयों की भांति बवाल काटा। क्या ये सामान्य गृहणियां थीं? हरगिज़ नहीं! प्रभावशाली ढंग से चल रहीं अराजकता फैलाने की गहरी साजिश है जिसका आगे विस्तार होने की संभावना है। साजिशकर्ता बहुत है। वे जानते हैं कि उपद्रवी महिलाओं के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई नहीं हो सकती। उत्तर प्रदेश को उपद्रव व अराजकता की आग में झोंकने की यह साजिश राज्य के व्यापक हित में विफल की जानी चाहिए।
छपते-छपते: आम आदमी पार्टी आई सामने। ललितपुर, बहराइच, बागपत, जालौन, मुजफ्फरनगर, चंदौली, बदायूं, मैनपुरी, मेरठ, सहारनपुर में भी लाठीधारी महिलाओं का बिजलीघरों पर धावा। भड़काने वाले नकाब पहिने हैं।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'