ऋषि दयानंद के विचारों, आदर्शों के प्रचार-प्रसार तथा प्राचीन वैदिक संस्कृति के उत्थान में जीवन समर्पित करने वाले स्वामी आनन्दवेश (नैष्ठिक ब्रह्मचारी बलदेव जी) की स्मृति सभा में देश भर से वैदिक विद्वानों-भद्रजनों ने पहली फरवरी को शुकतीर्थ पधार कर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की और गुरुकुल शिक्षा पद्ध‌ति के उन्नयन में उनके योगदान की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की।

24 जनवरी, 2026 को आनन्दवेश जी 92 वर्ष की अवस्था में संसार की यात्रापूर्ण कर गये थे। उनके निधन के समाचार से शुकतीर्थ ही नहीं अपितु भोपा-मोरना के गांव-गांव में शोक की लहर दौड़ गई क्योंकि यह क्षेत्र स्वामी जी की तपोभूमि भी और कर्मभूमि भी रहा है।

स्वामी जी का जन्म सन् 1922 में हरियाणा की खरखौदा तहसील के ग्राम कावली में हुआ। पिता का नाम मांगेराम, माता का नाम प्रेमो देवी था। बचपन का नाम बलदेव सिंह था। हरियाणा का ग्रामांचल आर्यसमाज से प्रभावित रहा है। आपने स्वामी आत्मानंद जी का शिष्य बन वैदिक संस्कृति की शिक्षा ग्रहण की, आर्य समाज के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ कर शिरकत की हिन्दी सत्याग्रह में जेल यात्रा भी की।

महाभारतकालीन तीर्थस्थल शुकताल तथा शिक्षा ऋषि स्वामी कल्याण देव जी का नाम सुनकर आपने भोपा-मोरना क्षेत्र को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। उनका उद्देश्य शुकतीर्थ में गुरुकुल पद्धति पर संस्कृत विद्यालय स्थापित कर भारतीय संस्कृति को सुदृढ़ बनाना था। स्वामी जी का प्रथम दर्शन का सौभाग्य मुझे 'देहात भवन' में प्राप्त हुआ। भोपा क्षेत्र के निर्गाजनी ग्राम में हमारी ननिहाल है। मामा महाशय फूलसिंह, जो जीवनपर्यन्त ग्राम के प्रधान रहे, ऋषि दयानंद सरस्वती के पक्के अनुयायी थे। वे एक दिन एक महानुभाव को लेकर पिताश्री राजरूप सिंह वर्मा के पास आये और 'बलदेव ब्रह्मचारी' के रूप में उनका परिचय कराया। चौड़ा सीना, कसरती बदन और तेजस्वी भुखमन्डल था। पिताश्री ने पूछा- 'क्या पहलवानी करते हैं, अखाड़ा जाते हैं।' मामा जी ने बताया कि ये मूलतः हरियाणावासी हैं और शुकताल में संस्कृत पाठशाला खोलना चाहते हैं। पिताश्री ने उनके प्रयास की सराहना की और स्वामी कल्याण देव जी से मिलने का परामर्श दिया। बलदेव ब्रह्मचारी ने बताया कि वे स्वामी जी से अनेक बार मिल चुके हैं और संस्कृत पाठशाला की स्थापना में स्वामी जी का आशीर्वाद प्राप्त है। उन्होंने बताया कि स्वामी जी ने परामर्श दिया है कि वे गांवों में जाकर ग्रामीण भाइयों का सहयोग प्राप्त करें।

भोपा-मोरना क्षेत्र के प्रत्येक गांव में पहुंच स्वामी आनन्द‌वेश जी ने वैदिक संस्कृति तथा गुरुकुल शिक्षा का प्रचार किया। इस इलाके का बच्चा-बच्चा उनके नाम से परिचित रहा है। नयी पीढ़ी के विषय में कुछ नहीं कह सकते।

हमें स्मरण है कि संस्कृत पाठशाला की स्थापना के लिए उन्हें रेतीले मिट्टी के बड़े-बड़े, ऊबड़-खाबड़ 'खोले' (टीले) मिले थे। तब के.पी. बहादुर मुजफ्फरनगर के जिला अधिकारी थे। बाद में योगेन्द्र नारायण जिला अधिकारी नियुक्त हुए। इन दोनों अधिकारियों ने स्वामी जी को पूर्ण सहयोग दिया। ये कल्याणदेव महाराज के परम भक्त थे। इन रेतीले टीलों को समतल कर वहां विद्यालय भवन स्थापित करने में स्वामी जी का कठोर परिश्रम आज एक अद्भुत मिसाल है।

हमें यह भी स्मरण है कि कार्तिक गंगा स्नान के मेले में (शुक्रताल में) स्वामी जी के शिविर में सर्वाधिक भीड़ जुटती थी। चौबीसों घंटे आर्यसमाज के भजन, ऋषि दयानन्द‌ की चर्चा होती। पृथ्वी सिंह बेधड़क के भजन सुनने अपार भीड़ उमड़‌ती थी।

'देहात' के संस्थापक संपादक स्व. राजरूप सिंह वर्मा से उनका आत्मीय संबंध रहा जिसका आधार वैदिक संस्कृति का प्रचार था। पिताश्री के निधन के पश्चात भी हमारा संपर्क बना रहा। एक बार दिल्ली के आर.आर. गुप्ता प्रेस से मेले का बड़ा पोस्टर लाये, उसमें मेरा नाम भी डाला था। यह भी याद है कि 'देहात' के प्रबंध संपादक रहे बाबू जयनारायण 'प्रकाश' ने शुकताल के संस्कृत विद्यालय में कुछ समय निःशुल्क शिक्षण कार्य किया था।

जाना तो सभी को है किन्तु हर्ष है कि समाज एवं आर्य जगत स्वामी आनन्दवेश के योगदान को नहीं भूला। ऐसे महान् ‌पुरुष की स्मृतिचिर स्थायी रहे, प्रभु से यही कामना। स्वामी जी की स्मृति में कोटिश नमन।

गोविंद वर्मा 

संपादक 'देहात'