केरल में चुनाव परिणामों से पहले राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म होता दिख रहा है। हालांकि इस बार मुकाबला सिर्फ सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और विपक्षी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच ही नहीं है, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी नेतृत्व को लेकर खींचतान खुलकर सामने आ गई है।

राज्य में मतदान प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब नतीजों का इंतजार किया जा रहा है। करीब एक दशक बाद सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठे यूडीएफ खेमे में जहां एक ओर उत्साह है, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री पद को लेकर शुरू हुई बहस ने पार्टी के भीतर असहज स्थिति पैदा कर दी है।

केरल की राजनीति में लंबे समय से सत्ता परिवर्तन का रुझान देखा जाता रहा है, लेकिन 2021 में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इस परंपरा को बदल दिया था। ऐसे में इस बार का चुनाव कांग्रेस और यूडीएफ के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

इसी बीच कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद के दावेदारों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं रमेश चेन्निथला, विपक्ष के नेता वी डी सतीशन और संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल के समर्थक खुले तौर पर अपने-अपने नेताओं के पक्ष में दावेदारी कर रहे हैं। इससे पार्टी के अंदर मतभेद और स्पष्ट होते जा रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिणाम आने से पहले इस तरह की सार्वजनिक बहस से मतदाताओं के बीच नकारात्मक संदेश जा सकता है और पार्टी की छवि प्रभावित हो सकती है। वरिष्ठ टिप्पणीकार एम एन करासेरी ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि सत्ता से पहले पद को लेकर संघर्ष जनता के भरोसे को कमजोर कर सकता है।

इस विवाद का असर कांग्रेस के सहयोगी दलों पर भी पड़ता दिख रहा है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेता पी अब्दुल हमीद ने भी इस तरह की सार्वजनिक चर्चा पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे यूडीएफ के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है, जो लंबे समय से विपक्ष में रहकर संघर्ष कर रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि नेतृत्व से जुड़ी ऐसी बहसों को सार्वजनिक मंच पर लाने के बजाय पार्टी के भीतर ही सुलझाया जाना चाहिए था। हालांकि उन्होंने यह भरोसा भी जताया कि पार्टी हाईकमान जो भी निर्णय लेगा, सभी घटक दल उसे स्वीकार करेंगे।

दूसरी ओर, वाम दल इस पूरे घटनाक्रम पर फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं और अपनी एकजुटता का संदेश देने में लगे हैं। इसके विपरीत कांग्रेस के भीतर उभरती गुटबाजी ने यूडीएफ खेमे में बेचैनी बढ़ा दी है। ऐसे में चुनाव परिणामों से पहले सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी गठबंधन के सामने सत्ता नहीं, बल्कि भीतर की एकता बनाए रखना बनती दिख रही है।