भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर चल रहे विवाद पर विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को अपना पक्ष सामने रखा। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रिश्ते सौहार्दपूर्ण रहे हैं और दोनों नेता हमेशा कूटनीतिक मर्यादाओं के तहत एक-दूसरे से संवाद करते आए हैं।
उन्होंने अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के उस बयान को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप से सीधे बातचीत न करने के कारण समझौता आगे नहीं बढ़ पाया। प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि यह धारणा सही नहीं है कि व्यक्तिगत संवाद की कमी से बातचीत रुकी हुई है। उन्होंने कहा कि फरवरी 2024 से अब तक दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं और संतुलित समझौते की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
रणधीर जायसवाल ने यह भी जानकारी दी कि वर्ष 2025 में अब तक प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच आठ बार टेलीफोन पर बातचीत हो चुकी है। भारत दोनों देशों की पूरक अर्थव्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे व्यापार समझौते के लिए प्रतिबद्ध है, जो सभी पक्षों के लिए लाभकारी हो।
अमेरिकी वाणिज्य मंत्री के बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई थी कि क्या भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ किसी व्यापारिक कारण से ज्यादा व्यक्तिगत नाराजगी का परिणाम हैं। कुछ दावों में यह कहा गया कि प्रधानमंत्री द्वारा सीधे हस्तक्षेप न किए जाने को राष्ट्रपति ट्रंप ने असम्मान के रूप में लिया और इसी वजह से कड़े शुल्क लगाए गए।
गौरतलब है कि हॉवर्ड लुटनिक ने एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में कहा था कि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता अंतिम चरण में था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से फोन न किए जाने के कारण मामला अटक गया। उनका यह बयान ऐसे समय आया, जब अमेरिका ने रूस से तेल आयात को लेकर भारत पर दबाव बढ़ाते हुए टैरिफ और सख्त करने की चेतावनी दी थी।
पिछले वर्ष अगस्त में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर कुल 50 प्रतिशत शुल्क लगाया था, जिसमें रूस से तेल खरीद जारी रखने के जवाब में लगाया गया अतिरिक्त शुल्क और पारस्परिक टैरिफ शामिल थे।
हालांकि महीनों से चल रही बातचीत के बावजूद व्यापार समझौते पर ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है। पहले यह माना जा रहा था कि गतिरोध की वजह कृषि क्षेत्र से जुड़े नीतिगत मतभेद हैं, लेकिन हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि व्यक्तिगत कूटनीति को लेकर बने मतभेदों ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है। तनाव उस समय और बढ़ गया, जब प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में मध्यस्थता को लेकर किए गए अमेरिकी दावों को खारिज किया और नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़े मुद्दे पर भी समर्थन नहीं दिया।