तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है और इसका असर पार्टी के संसदीय दल तक दिखाई दे रहा है। हाल ही में पार्टी की लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार के एक दावे ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।

काकोली घोष दस्तीदार ने कहा था कि टीएमसी के लगभग 20 सांसदों ने एनडीए के समर्थन में जाने का निर्णय लिया है। यह बयान ऐसे समय में आया जब पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी विपक्षी गठबंधन की रणनीति को लेकर दिल्ली में बैठकों में शामिल थीं।

हालांकि, इस दावे को लेकर टीएमसी के ही कई नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई है और इसे पूरी तरह गलत बताया है।

टीएमसी नेताओं का पलटवार

टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद और पार्टी नेता कुणाल घोष ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह जनता को गुमराह करने की कोशिश है। कीर्ति आजाद ने कहा कि काकोली घोष दस्तीदार द्वारा खुद को मुख्य सचेतक बताकर दिए जा रहे बयान तथ्यहीन हैं, क्योंकि पार्टी नेतृत्व पहले ही इस पद में बदलाव कर चुका है।

उन्होंने दावा किया कि लोकसभा अध्यक्ष को इस बदलाव की आधिकारिक जानकारी दी जा चुकी है, जिसके तहत कल्याण बनर्जी को नया मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया है।

बैठक और सांसदों की संख्या पर विवाद

कीर्ति आजाद ने यह भी कहा कि एनडीए से जुड़ी एक कथित बैठक में जिन 20 सांसदों के शामिल होने की बात कही जा रही है, वह संख्या गलत है। उनके अनुसार, केवल 13 सांसद ही उस बैठक में मौजूद थे, जिनमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य शामिल थे।

भाजपा पर आरोप

टीएमसी नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी पर राजनीतिक माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाया है। कीर्ति आजाद ने कहा कि भाजपा ‘डर्टी ट्रिक्स’ का इस्तेमाल कर झूठा नैरेटिव फैलाने की कोशिश कर रही है।

पार्टी लाइन पर सवाल और तीखी प्रतिक्रिया

टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा ने भी पार्टी के भीतर के कुछ बयानों पर नाराजगी जताई। उन्होंने यूसुफ पठान के संदर्भ में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सांसदों को अपने जनादेश और जिम्मेदारी को गंभीरता से समझना चाहिए।

काकोली घोष का पुराना दावा

इस पूरे विवाद की शुरुआत काकोली घोष दस्तीदार के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि लगभग 20 टीएमसी सांसद एनडीए को समर्थन देने के पक्ष में हैं। उन्होंने यह भी दावा किया था कि यह निर्णय सांसदों के बीच विचार-विमर्श के बाद लिया गया है।

बढ़ता राजनीतिक तनाव

यह पूरा घटनाक्रम टीएमसी के भीतर बढ़ती असहमति और संगठनात्मक तनाव को उजागर करता है। हाल के समय में पार्टी के भीतर कुछ नेताओं के असंतोष और बयानबाज़ी ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है।