केरलम विधानसभा चुनाव की मतगणना में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने बड़ी बढ़त हासिल करते हुए 99 सीटों पर कब्जा कर लिया है। वहीं सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को 35 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को केवल 3 सीटों पर जीत मिली है। इस परिणाम के साथ देश में वामपंथी दलों की किसी भी राज्य में सत्ता समाप्त हो गई है।

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कन्नूर जिले की धर्मदम सीट से शुरुआती रुझानों में पिछड़ने के बाद वापसी करते हुए जीत दर्ज की। अंतिम चरणों की मतगणना में उन्होंने 8,000 से अधिक वोटों की बढ़त हासिल कर ली। दूसरी ओर LDF संयोजक टी.पी. रामकृष्णन को कोझिकोड की पेरम्ब्रा सीट से हार का सामना करना पड़ा, जहां उन्हें IUML की फातिमा तहलिया ने पराजित किया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला ने हरिपाद सीट से बड़ी जीत दर्ज की और सीपीआई उम्मीदवार को 23,000 से अधिक वोटों से हराया। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री के. करुणाकरण की बेटी पद्मजा वेणुगोपाल को त्रिशूर सीट से एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा। पय्यानूर सीट पर UDF समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार वी. कुन्हीकृष्णन की जीत ने सभी को चौंका दिया। इस चुनाव में CPI(M) के कई बागी उम्मीदवारों ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया।

तिरुवनंतपुरम स्थित कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में जीत के रुझानों के बीच जश्न का माहौल देखने को मिला। कार्यकर्ताओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ उत्सव मनाया, मिठाइयां बांटीं और बढ़त के आंकड़ों पर खुशी जताई। केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) अध्यक्ष सन्नी जोसेफ ने इस नतीजे को LDF सरकार की नीतियों के खिलाफ जनमत बताया। वहीं IUML नेताओं ने इसे UDF की एकजुटता और जनता के समर्थन की जीत करार दिया।

लेफ्ट के लिए हार के प्रमुख कारण

लगातार दो कार्यकाल से सत्ता में रही LDF सरकार के खिलाफ इस बार सत्ता-विरोधी लहर स्पष्ट रूप से दिखाई दी। मतदाताओं ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया।

विपक्ष ने सरकार पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप लगाए, जिसका असर जनमानस पर पड़ा और सरकार के खिलाफ माहौल बना।

कई मंत्रियों की हार ने यह संकेत दिया कि असंतोष केवल राजनीतिक स्तर पर नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी मौजूद था।

CPI(M) के भीतर असंतुष्ट और बागी नेताओं के चुनाव लड़ने से संगठन का वोट बैंक बिखर गया।

अल्पसंख्यक वोटों का एक बड़ा हिस्सा UDF के पक्ष में एकजुट हुआ, जिसने परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।

कांग्रेस के आक्रामक प्रचार अभियान, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर फोकस ने भी मतदाताओं को प्रभावित किया।

केरलम की पारंपरिक राजनीतिक प्रवृत्ति के अनुसार सत्ता परिवर्तन का रुझान इस बार भी दोहराया गया, जिससे LDF को सत्ता से बाहर होना पड़ा।