20 रुपये की रिश्वत, 30 साल चला मुकदमा, बरी होने के अगले दिन कांस्टेबल की मौत

गुजरात से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति ने 20 रुपए की रिश्वत लेने के आरोप को मिटाने के लिए करीब 30 साल तक कानूनी जंग लड़ी। आखिरकार 4 फरवरी को हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया और उनका नाम साफ हो गया। लेकिन इस खुशी को वह ज्यादा देर तक जी नहीं सके। अदालत से बरी होने के एक दिन बाद ही उनका निधन हो गया।
कैसे शुरू हुआ मामला
यह मामला 20 नवंबर, 1996 का है, जब बाबूभाई प्रजापति समेत वेजलपुर पुलिस स्टेशन में तैनात दो अन्य कांस्टेबलों पर ट्रक ड्राइवरों से 20-20 रुपए की रिश्वत लेने का आरोप लगा। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने जाल बिछाकर तीनों को पकड़ा और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। उस समय प्रजापति की उम्र 34 साल थी।
ट्रायल कोर्ट का फैसला और सजा
साल 2004 में अहमदाबाद की ट्रायल कोर्ट ने प्रजापति और अन्य दो कांस्टेबलों को दोषी ठहराते हुए चार-चार साल की जेल और तीन-तीन हजार रुपए का जुर्माना सुनाया। इस फैसले के चलते तीनों की नौकरी भी चली गई।
हाई कोर्ट ने दी राहत
इसके बाद तीनों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। 4 फरवरी को जस्टिस एसवी पिंटो ने फैसला सुनाते हुए प्रजापति समेत सभी कांस्टेबलों को बरी कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि गवाहों की गवाही में विसंगतियां थीं और जांच में खामियां थीं। अदालत ने सजा को रद्द कर दिया।
खुशी के बाद अचानक मौत
अदालत से बरी होने के बाद प्रजापति बेहद खुश थे। उन्होंने वकील नितिन गांधी से कहा, “अब मेरी जिंदगी से दाग हट गया है, अगर भगवान मुझे उठा भी लें तो कोई दुख नहीं होगा।” लेकिन अगले दिन अचानक उनका हार्ट अटैक से निधन हो गया। वकील ने बताया कि प्रजापति कोर्ट के फैसले से बहुत खुश थे, लेकिन मृत्यु ने उन्हें खुशी का जश्न मनाने का मौका नहीं दिया।
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