भारतीय आर्थिक व्यवस्था में बड़े बदलाव की आवश्यकता: मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने और एच1बी वीजा की लागत में इजाफा होने जैसी परिस्थितियों से भारत उबर सकता है, लेकिन अगर देश को वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है तो आर्थिक व्यवस्था में बड़े बदलाव जरूरी हैं।
भागवत रविवार को प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय में नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार की पुस्तक "एवरीथिंग ऑल एट वन्स" के विमोचन समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान धन और श्रम पर आधारित वैश्विक व्यवस्था देशों के बीच संघर्ष पैदा करती है, अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ाती है और ताकतवर कमजोरों पर अत्याचार करते रहते हैं।
उन्होंने पर्यावरणीय और सतत विकास पर जोर देते हुए कहा कि यह समस्या आयातित प्रथाओं से उत्पन्न हुई है। भागवत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बनने से पहले अमेरिका में एक व्यक्ति से हुई चर्चा का जिक्र करते हुए कहा कि देश हमेशा अपने हितों के अनुसार कदम उठाता है, और तब तक संघर्ष जारी रहेगा जब तक व्यक्तिगत हित प्रमुख रहेंगे।
सरसंघचालक ने शासन में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि शासन का उद्देश्य केवल प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि जनता की सेवा होना चाहिए। उन्होंने अधिक उत्पादन के बजाय जनता के लिए अधिक उत्पादन करने की नीति अपनाने का सुझाव दिया।
हीरो एंटरप्राइज के अध्यक्ष सुनील कांत मुंजाल ने देश में अपार संभावनाओं का जिक्र करते हुए हस्तशिल्प और हथकरघा जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रो. महेंद्र देव और द कन्वर्जेंस फाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ आशीष धवन ने भी स्थायी और समावेशी आर्थिक विकास के लिए सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित किया।
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