सिंधु जल संधि पर भारत का पक्ष, विनय मोहन क्वात्रा बोले- पाकिस्तान ने खत्म की सद्भावना

HIGHLIGHTS
- क्वात्रा ने सिंधु जल संधि के इतिहास और भारत के फैसले पर बात रखी।
- उन्होंने पाकिस्तान से आतंकी ढांचे को खत्म करने की अपील की।
- भारत की जलविद्युत परियोजनाओं में बाधाओं का भी किया जिक्र।
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को लेकर कहा है कि यह समझौता सद्भावना और मित्रता की भावना के साथ किया गया था, लेकिन पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों में इस भावना को लगातार कमजोर किया।
उन्होंने कहा कि भारत की ओर से संधि को स्थगित रखने का फैसला केवल उस स्थिति को स्वीकार करना है, जिसे पाकिस्तान के व्यवहार ने पहले ही बदल दिया था।
क्वात्रा ने यह बात न्यूजवीक पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में कही है। उनका यह लेख ऐसे समय सामने आया है, जब हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले के विरोध में एक सम्मेलन आयोजित किया था। भारत ने यह कदम जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद उठाया था, जिसमें पाकिस्तान से प्रशिक्षित आतंकियों ने 26 लोगों की हत्या कर दी थी।
'संधि की प्रस्तावना में सद्भावना और मित्रता का जिक्र'
क्वात्रा ने अपने लेख में लिखा कि सिंधु जल संधि की प्रस्तावना में इसे "सद्भावना और मित्रता की भावना" से किया गया समझौता बताया गया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने आधी सदी तक इस भावना को कमजोर करने का काम किया।
उन्होंने कहा कि संधि को स्थगित रखने का फैसला केवल उसी वास्तविकता को स्वीकार करता है, जिसे पाकिस्तान के आचरण ने पहले ही नष्ट कर दिया था।
'पाकिस्तान ने युद्ध और आतंकवाद का रास्ता अपनाया'
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत को सिंधु बेसिन की छह नदियों में से तीन नदियों पर नियंत्रण मिला, जिनमें कुल जल का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा बहता है। वहीं, पाकिस्तान को उन नदियों का अधिकार मिला, जिनमें लगभग 80 प्रतिशत पानी बहता है।
क्वात्रा ने कहा कि इस असंतुलन के बावजूद भारत ने संधि का सम्मान किया, हालांकि इसके कारण भारत के कई क्षेत्रों का विकास लंबे समय तक प्रभावित रहा।
उन्होंने कहा कि इसके जवाब में पाकिस्तान ने 1965, 1971 और 1999 में भारत के खिलाफ युद्ध किए। इसके अलावा सीमा पार आतंकवाद भी जारी रखा, जिसमें 2001 का संसद हमला, 2008 का मुंबई आतंकी हमला, 2016 के उरी और पठानकोट हमले, 2019 का पुलवामा हमला और 2025 का पहलगाम आतंकी हमला शामिल हैं।
'आतंकी ढांचे को खत्म करे पाकिस्तान'
क्वात्रा ने कहा कि अगर पाकिस्तान वास्तव में भारत के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर सहयोग करना चाहता है तो उसे सबसे पहले वर्षों से तैयार किए गए आतंकी ढांचे को खत्म करना होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि संधि के तहत भारत द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं में पाकिस्तान ने लगातार बाधाएं पैदा कीं और प्रशासनिक स्तर पर देरी की।
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने तकनीकी बदलावों को देखते हुए संधि में संशोधन के भारत के प्रयासों का विरोध किया, जिससे भारत अपनी जलविद्युत क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर सका।
'पाकिस्तान के रवैये से भारत का भरोसा टूटा'
क्वात्रा ने कहा कि समय के साथ पाकिस्तान ने भारत का वह भरोसा खत्म कर दिया कि वह संधि के तहत अपने अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल कर सकता है या मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार बेहतर व्यवस्था की उम्मीद कर सकता है।
उन्होंने कहा कि जो लोग भारत और पाकिस्तान के बीच दोबारा बातचीत की वकालत करते हैं, वे या तो इतिहास से अनजान हैं या फिर यह मानते हैं कि एक ही तरीके को बार-बार अपनाने से अलग परिणाम मिल सकते हैं।
क्वात्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था, "आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते... आतंक और व्यापार साथ-साथ नहीं चल सकते... पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।"
'पाकिस्तान की जल समस्या के लिए भारत जिम्मेदार नहीं'
क्वात्रा ने कहा कि पाकिस्तान में पानी की कमी के लिए भारत नहीं, बल्कि वहां की खराब जल प्रबंधन व्यवस्था जिम्मेदार है।
उन्होंने कहा कि भारत पर आरोप लगाने और धमकियां देने के बजाय पाकिस्तान सरकार को अपनी जल उत्पादकता और जल प्रबंधन प्रणाली में सुधार पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की हर घरेलू समस्या के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की आदत पुरानी हो चुकी है और दुनिया को इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
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