राम मदिर विवाद: 'दान चोरी से भी शर्म नहीं आती', भ्रष्टाचार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी

HIGHLIGHTS
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार पर सख्त टिप्पणी की और राम मंदिर दान चोरी मामले का जिक्र किया।
- कोर्ट ने भ्रष्ट अफसरों पर भी कार्रवाई की जरूरत बताई।
- आरोपी के घर ध्वस्तीकरण को लेकर हाई कोर्ट के दोनों जजों में मतभेद सामने आया।
प्रयागराज। देश में भ्रष्टाचार को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर में दान की चोरी के मामले के बाद भी लोगों में शर्म का भाव नहीं आया है। यह ईमानदारी के सबसे निचले स्तर को दर्शाता है। अब गलत काम को तभी गलत माना जाता है, जब व्यक्ति पकड़ा जाए।
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि भ्रष्टाचार में दोषी पाए जाने वालों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान होना चाहिए। उन्होंने ये टिप्पणियां हमीरपुर के फैमुद्दीन और दो अन्य की याचिका का निस्तारण करते हुए कीं। याचिकाकर्ताओं ने बुलडोजर कार्रवाई की आशंका जताते हुए अदालत से संरक्षण की मांग की थी। इस याचिका की सुनवाई करने वाली खंडपीठ में न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन भी शामिल थे।
जज ने 51 पेज के फैसले में रखी अपनी बात
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने अपने 51 पेज के फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उन्होंने वरिष्ठ न्यायमूर्ति से कुछ बिंदुओं पर असहमति जताई है। अब यह मामला तीसरे न्यायमूर्ति को भेजा जाएगा।
अपने निर्णय में उन्होंने लिखा कि कई दशकों से औसत भारतीय ने भ्रष्टाचार को सामान्य मान लिया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 182 देशों में भारत 91वें स्थान पर है, लेकिन इसके बावजूद लोगों में शर्म का भाव नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि राम मंदिर में आए दान की चोरी का विवाद इस स्थिति को और उजागर करने वाला साबित हुआ।
रिश्वत लेकर आंखें बंद कर लेते हैं अधिकारी: हाई कोर्ट
अदालत ने कहा कि राम मंदिर में दान चोरी जैसे मामले भी लोगों को विचलित नहीं करते तो इससे बड़ी चिंता की बात और क्या हो सकती है।
पीठ ने कहा कि नगर निगम और अन्य प्राधिकरणों के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से बिल्डर अवैध निर्माण कर लेते हैं। अधिकारी रिश्वत लेकर आंखें बंद कर लेते हैं। बाद में जब कानून के तहत कार्रवाई होती है तो आम खरीदार प्रभावित होता है और उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में बेदखली की प्रक्रिया शुरू होने के छह महीने के भीतर मकान गिरा दिए जाते हैं।
दोषी अधिकारियों को भी सजा देने की बात
हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य की भ्रष्ट नौकरशाही भी अवैध कब्जों के लिए उतनी ही जिम्मेदार है। इसलिए जब अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई हो तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि अवैध कब्जे को सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन राज्य की बेईमानी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
एफआईआर के बाद दो साल तक घर न गिराने का निर्देश
याचिकाकर्ताओं के रिश्तेदार आफान खान पर पॉक्सो और मतांतरण मामले में आरोप है। याचियों का कहना है कि आरोपित का उनकी संपत्तियों—आवासीय मकान, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और आरा मिल—में कोई स्वामित्व नहीं है, फिर भी उन्हें सील और ध्वस्त करने की कार्रवाई की जा रही है।
सरकार की ओर से कहा गया कि फैमुद्दीन भी मामले में जेल जा चुका है और याचिकाकर्ताओं ने तथ्यों को छिपाया है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने अपने फैसले में निर्देश दिया कि मुकदमा दर्ज होने की तारीख से दो वर्ष तक किसी आरोपित के घर को ध्वस्त न किया जाए। साथ ही यदि कोई व्यक्ति तीन वर्ष या उससे अधिक समय से किसी स्थान पर रह रहा है तो प्राधिकरण को ध्वस्तीकरण से एक वर्ष पहले सूचना देनी होगी, ताकि संबंधित व्यक्ति वैकल्पिक व्यवस्था कर सके।
दोनों न्यायमूर्तियों के बीच रही असहमति
इस निर्देश पर न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन ने असहमति जताई है। उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट को दो वर्ष जैसी निश्चित समय-सीमा तय करने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि कार्रवाई से बचने के लिए लोग एफआईआर दर्ज करा सकते हैं। ध्वस्तीकरण से पहले एक वर्ष की नोटिस ऑफ इंटेंट देने की शर्त पर भी उन्होंने अपनी सहमति नहीं जताई।
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