SCO Summit से पहले बिश्केक पहुंचे ट्रंप के खास दूत सर्जियो गोर, बढ़ी कूटनीतिक हलचल

HIGHLIGHTS
- बिश्केक में मंगलवार को SCO की शिखर बैठक होगी।
- सर्जियो गोर ने राष्ट्रपति सादिर झापारोव से मुलाकात की।
- दोनों नेताओं के बीच निवेश और डिजिटल तकनीक पर चर्चा हुई।
किर्गिजस्तान की राजधानी बिश्केक में मंगलवार को होने वाली शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शिखर बैठक के लिए सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन जैसे प्रमुख नेता वहां पहुंच चुके हैं या पहुंचने वाले हैं।
इसी बीच एक और खास मेहमान बिश्केक पहुंच गया है। यह मेहमान अमेरिका के नई दिल्ली में राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रतिनिधि सर्जियो गोर हैं। ब्रिक्स और एससीओ जैसे संगठनों को लेकर संशकित रहने वाले ट्रंप ने इस बार अपने भरोसेमंद सहयोगी को कूटनीतिक प्रबंधन के लिए बिश्केक भेजा है।
अमेरिकी बयान पर रहेगी नजर
अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि अमेरिका की इस कोशिश का 1 सितंबर 2026 को शिखर बैठक के बाद जारी होने वाले संयुक्त बयान पर कोई असर पड़ता है या नहीं। उम्मीद है कि संयुक्त बयान में चीन, रूस और ईरान की वजह से पश्चिम एशिया में अमेरिकी गतिविधियों को लेकर निशाना साधा जा सकता है। बतौर अध्यक्ष संयुक्त बयान की भाषा तय करने में किर्गिजस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।
हालांकि, गोर के इस दौरे को आधिकारिक तौर पर किर्गिजस्तान की स्वतंत्रता दिवस की 35वीं वर्षगांठ और विश्व नोमैड गेम्स के उद्घाटन से जोड़ा गया है, लेकिन समय का संयोग कूटनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। एससीओ जैसे मंच पर अमेरिका की प्रत्यक्ष मौजूदगी नहीं होना या इस संगठन में किसी भरोसेमंद सहयोगी का न होना ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।
बिश्केक पहुंचकर गोर ने किससे मुलाकात की?
बिश्केक पहुंचने के बाद गोर ने राष्ट्रपति सादिर झापारोव से मुलाकात की। दोनों के बीच द्विपक्षीय सहयोग, निवेश, डिजिटल तकनीक और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को लेकर चर्चा हुई। झापारोव आने वाले समय में अमेरिका की यात्रा पर भी जाने वाले हैं।
पिछले साल तियानजिन में हुए एससीओ सम्मेलन की तस्वीर अभी भी चर्चा में है। उस समय मोदी, पुतिन और शी चिनफिंग की एक साथ तस्वीरें अमेरिका में काफी चर्चा का विषय बनी थीं। ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति और रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर दबाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी का चीन जाना वॉशिंगटन के लिए असहजता का कारण बना था।
विपक्ष और आलोचकों ने ट्रंप पर आरोप लगाया था कि उनकी नीतियों के कारण भारत अमेरिका से दूर जा रहा है। ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर टिप्पणी की थी कि अमेरिका ने भारत और रूस को चीन के पाले में खो दिया है।
मध्य एशिया में सक्रियता बढ़ा रहा ट्रंप प्रशासन
इसी अनुभव के बाद ट्रंप प्रशासन ने अब मध्य एशिया में अपनी सक्रियता बढ़ाई है। गोर को भारत का राजदूत बनाने के साथ-साथ पूरे दक्षिण और मध्य एशिया का विशेष दूत भी नियुक्त किया गया है। ताशकंद में जन्मे गोर क्षेत्र की भाषाओं से परिचित हैं और ट्रंप के करीबी माने जाते हैं।
अमेरिका की कोशिश है कि एससीओ के सदस्य पूरी तरह रूस-चीन धुरी की ओर न जाएं। एससीओ में अमेरिका की चिंता की एक बड़ी वजह यह है कि संगठन के किसी भी पूर्ण सदस्य पर ट्रंप प्रशासन पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता। रूस और चीन पश्चिमी प्रभाव के विरोधी माने जाते हैं।
ईरान पश्चिम एशिया संकट और अमेरिका की नीतियों की खुलकर आलोचना करता है। एससीओ के मंच पर अगर तेहरान वाशिंगटन के खिलाफ कोई मुद्दा उठाता है, तो उसका संतुलन करने वाला कोई सदस्य देश मौजूद नहीं है।
यह स्थिति ब्रिक्स से अलग है। ब्रिक्स में संयुक्त अरब अमीरात जैसा देश शामिल है, जो ईरान की ओर से उठाए गए कई मुद्दों का व्यावहारिक जवाब पेश कर सकता है। एससीओ में ऐसी कोई शक्ति संतुलनकारी भूमिका निभाती नजर नहीं आती।
इसी वजह से अमेरिका मध्य एशियाई देशों, खासकर किर्गिजस्तान, कजाखस्तान और उज्बेकिस्तान को आर्थिक साझेदारी और निवेश के जरिए अपने करीब लाने की कोशिश कर रहा है।
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