गुरुग्राम। चमक-दमक और आधुनिक जीवनशैली के लिए पहचानी जाने वाली साइबर सिटी का एक दूसरा, चिंताजनक चेहरा भी सामने आ रहा है। बीते एक वर्ष में शहर में 400 से अधिक लोगों ने आत्महत्या कर ली, जिसने समाज और प्रशासन दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से करीब 70 प्रतिशत मामलों में वजह बेहद मामूली रही जैसे घरेलू विवाद, आपसी कहासुनी या रोजमर्रा की छोटी समस्याएं।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में जहां आत्महत्या के करीब 350 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2025 में इनकी संख्या और बढ़ गई। विशेषज्ञों का मानना है कि तेज़ रफ्तार जीवन, बढ़ता मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक अपेक्षाएं लोगों की सहनशक्ति को लगातार कमजोर कर रही हैं। बीते साल ट्रेन की चपेट में आने से 130 से अधिक मौतें हुईं, जिनमें बड़ी संख्या आत्महत्या से जुड़े मामलों की बताई जा रही है।

चिंता का विषय यह भी है कि किशोरों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। परीक्षा में कम अंक आने, माता-पिता की डांट या अपेक्षाओं के दबाव में कई किशोर अत्यधिक कदम उठा रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि आज का युवा भावनात्मक रूप से अधिक संवेदनशील हो गया है और असफलता को स्वीकार करने की क्षमता लगातार घटती जा रही है।

मनोचिकित्सकों के अनुसार, एकाकी परिवार व्यवस्था भी इस संकट को बढ़ा रही है। संयुक्त परिवारों के टूटने से भावनात्मक सहारा कम हुआ है, जबकि माता-पिता का अत्यधिक संरक्षण बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर बना रहा है। पहले बच्चे घर से बाहर खेलते थे, गिरते-पड़ते थे और जीवन के छोटे संघर्षों से जूझना सीखते थे, लेकिन अब उनकी बाहरी गतिविधियां सीमित हो गई हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप और टीवी ने बच्चों की दुनिया समेट दी है, जिससे सामाजिक संवाद और भावनात्मक मजबूती प्रभावित हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आत्महत्या जैसी घटनाओं को रोकने के लिए समाज को सामूहिक प्रयास करने होंगे। मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेने, तनाव से निपटने के तरीके सिखाने और लोगों को भावनात्मक सहारा देने की जरूरत है। साथ ही धैर्य, संवाद और समझदारी को बढ़ावा देकर ही एक सुरक्षित और स्वस्थ समाज की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है।

आत्महत्या के प्रमुख कारणों में मानसिक तनाव, आर्थिक दबाव, गंभीर बीमारी, पारिवारिक और व्यक्तिगत समस्याएं, नशे की लत, सामाजिक अपेक्षाएं, घरेलू हिंसा, असफलता और निराशा जैसे कारक सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते संवाद और सहायता मिल जाए, तो कई जिंदगियों को बचाया जा सकता है।