बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया कि नागरिकों को स्वच्छ और पीने योग्य पानी मिलना उनका मौलिक अधिकार है। अदालत ने महाराष्ट्र में गहराते जल संकट पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार से पूछा कि इस समस्या का स्थायी समाधान आखिर कब तक सुनिश्चित किया जाएगा।

न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनमें विशेष रूप से आदिवासी बहुल मेलघाट क्षेत्र की स्थिति का मुद्दा उठाया गया, जहां कुपोषण और बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते नवजातों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मौतों का गंभीर मामला सामने आया है।

जल संकट और गंभीर हालात पर सुनवाई

अदालत को बताया गया कि भीषण गर्मी के बीच मेलघाट क्षेत्र गंभीर जल संकट से जूझ रहा है और यहां सुरक्षित पेयजल की भारी कमी बनी हुई है। पिछली सुनवाई में यह जानकारी भी सामने आई थी कि दूषित पानी के कारण क्षेत्र में 13 लोगों की मौत हो चुकी है।

सोमवार की सुनवाई में राज्य सरकार ने पक्ष रखते हुए कहा कि प्रभावित इलाकों में टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति की जा रही है। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने सरकार के इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर स्थिति काफी अलग है और पानी की आपूर्ति नियमित नहीं है।

अदालत की सख्त टिप्पणी

सरकार के जवाब से असंतुष्ट अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पानी के टैंकर भेजना कोई विशेष कृपा नहीं, बल्कि सरकार की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना संविधान के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है।

हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जल संकट केवल मेलघाट तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में गंभीर स्थिति बनी हुई है। अदालत ने सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है और पूछा है कि इस समस्या का समाधान कब तक किया जाएगा।

रिपोर्ट पेश करने का निर्देश

कोर्ट ने राज्य सरकार को अब तक उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने अगली सुनवाई मंगलवार को तय की है और सरकार को जल्द विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत करने को कहा है।