मेरठ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि संघ का मकसद सत्ता हासिल करना नहीं है। उनका कहना था कि संघ का मूल उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना और उसके व्यक्तित्व निर्माण में योगदान देना है। संघ किसी विशेष वर्ग या समुदाय के खिलाफ नहीं बल्कि संपूर्ण समाज के विकास के लिए कार्य करता है।

शताब्दीनगर स्थित माधवकुंज में मेरठ और ब्रज प्रांत के लगभग 950 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से बातचीत के दौरान डॉ. भागवत ने कहा कि कुछ लोग संघ को समावेशी संगठन मानते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी की विरासत का देश है।

हिंदू शब्द को समझाते हुए उन्होंने कहा कि यह कोई जाति नहीं, बल्कि एक विशेषण है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब समाज में एकता टूटती है, तब राष्ट्र संकट में पड़ता है। डॉ. भागवत ने यह भी कहा कि पूजा पद्धति और देवी-देवता भले अलग हों, लेकिन विविधता में एकता का भाव ही हमारी संस्कृति का आधार है।

संघ के कार्यों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि संगठन समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय है। संघ का उद्देश्य केवल हिंदू समाज के संगठन के लिए व्यक्ति निर्माण करना है। उन्होंने खिलाड़ियों के सवालों का भी विस्तार से जवाब दिया।

मेरठ – स्वतंत्रता संग्राम की जन्मभूमि

डॉ. भागवत ने मेरठ को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की धरा के रूप में याद किया। उनका कहना था कि यही वह जगह थी जहां से देश में स्वतंत्रता की चिन्गारी फूटी और पूरे देश में जागरूकता फैली। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की तीन धाराओं – सशस्त्र आंदोलन, कांग्रेस के माध्यम से जनता जागृति और समाज सुधार आंदोलनों – का उल्लेख किया और बताया कि डॉ. हेडगेवार ने इन सभी पहलुओं को समझकर 1925 में संघ की स्थापना की।

संघ से जुड़ने के पांच मंत्र

संघ प्रमुख ने समाजसेवी और खिलाड़ियों को संघ से जुड़ने के पांच मार्ग भी बताए:

  1. संघ के कार्यक्रमों में भाग लेकर संगठन को भीतर से समझें और जिम्मेदारी निभाएं।

  2. संघ के किसी सहायक संगठन से जुड़कर कार्य करें।

  3. संघ के कार्यक्रमों में किसी रूप में सहयोग दें।

  4. अपने काम के दौरान संघ और स्वयंसेवकों के साथ संपर्क बनाए रखें।

  5. देश के लिए सच्चाई और निस्वार्थ भाव से योगदान करें।

डॉ. भागवत ने कहा कि इन मंत्रों का पालन करने वाले व्यक्ति स्वयंसेवक हों या न हों, उनका योगदान संगठन और समाज के लिए मूल्यवान है।