समर्पण देखो !

लख-चौरासी जीवों का यह विचरण देखो,

मन में होता भले-बुरे का घर्षण देखो।

जिनके छूने से तर जाती शापित नारी,

उन पाँवों की कोमलता का अर्पण देखो।

पराकाष्ठा श्रद्धा औ' विश्वास की ये है,

धरती से सूरज तक पहुँचे तर्पण देखो।

श्रद्धा से नत हो जाएगा शीश तुम्हारा,

नदिया का सागर के लिए समर्पण देखो।

कहाँ नहीं हैं उसके मिलने की आशाएँ ,

मिल जायेगा ढूँढ़े से, तुम कण-कण देखो।

भेद नहीं है उसके आगे जात-पात का,

सबकी‌ झोली भरता है बिन कारण‌ देखो।

बीनाई की हद से आगे  कितना कुछ है,

खुद को जानो-समझो 'सूना' दर्पण देखो।

                   -प्रकाश 'सूना'