कुछ महीने पहले तक अमेरिका लगातार भारत से रूस से तेल खरीद बंद करने के लिए दबाव डाल रहा था। उस समय अमेरिकी प्रशासन ने भारत को रूसी तेल से दूर रखने के लिए 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने जैसे कदमों का संकेत भी दिया था।
लेकिन अब वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच अमेरिका ने अपनी सोच बदल दी है। अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कहा कि भारत ने वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी लिखा कि अमेरिका और भारत को मिलकर वैश्विक तेल बाजार की संतुलन बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि भारत दुनिया के बड़े तेल उपभोक्ताओं और रिफाइनिंग केंद्रों में से एक है।
तेल बाजार में अनिश्चितता और भारत की भूमिका
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि भारत को रूस से तेल खरीदने की जो छूट दी गई है, उसका उद्देश्य वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर अस्थिरता को कम करना है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद तेल बाजार में आपूर्ति संबंधी चिंता और कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है।
विश्व स्तर पर यह अस्थिरता कई देशों को प्रभावित कर रही है। अमेरिका की चिंता है कि यदि मांग और सप्लाई में संतुलन बिगड़ा तो उसके ईरान पर कार्रवाई का विरोध बढ़ सकता है। इसी कारण अमेरिका अब उन देशों की भूमिका को महत्व दे रहा है जो वैश्विक बाजार में संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
भारत पर पहले का दबाव, अब सहयोग की भूमिका
कुछ समय पहले ट्रंप प्रशासन भारत से रूस से तेल खरीदना बंद करने की मांग कर रहा था। पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते अमेरिका चाहता था कि बड़े खरीदार रूस से दूरी बनाएं। उस समय भारत को 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ का खतरा भी बताया गया था।
लेकिन पश्चिम एशिया में युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के चलते अब वही अधिकारी भारत की खरीद को वैश्विक बाजार की स्थिरता के लिए फायदेमंद मान रहे हैं। अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत एरिक गार्सेटी भी मान चुके हैं कि भारत को रूसी तेल खरीदने की छूट इसलिए दी गई ताकि वैश्विक बाजार में अचानक उतार-चढ़ाव न आए।
भारत का वैश्विक तेल बाजार में महत्व
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, जो प्रतिदिन करीब 55–56 लाख बैरल तेल का उपयोग करता है। यह वैश्विक तेल खपत का लगभग 5–6 प्रतिशत हिस्सा है। इसलिए भारत की खरीद का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ता है।
यदि भारत अपनी तेल खरीद अचानक कम कर दे या किसी बड़े स्रोत से तेल लेना बंद कर दे, तो वैश्विक मांग का हिस्सा अन्य सप्लायरों की ओर चलेगा। इससे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है और कई देशों के लिए आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है।
रिफाइनिंग हब के रूप में भारत
भारत न केवल बड़ा उपभोक्ता है, बल्कि रिफाइनिंग हब भी है। देश की रिफाइनरियां आयातित कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रो उत्पादों में बदलती हैं और इन्हें एशिया और यूरोप समेत अन्य क्षेत्रों में निर्यात भी करती हैं। इसी कारण भारत की खरीद वैश्विक सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पश्चिम एशिया में संघर्ष और सप्लाई मार्गों पर खतरे के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ज्यादा संवेदनशील हो गया है। ऐसे में अमेरिका अब भारत की भूमिका को समझ रहा है और जिस रूस से तेल खरीद को लेकर पहले चेतावनी दी जा रही थी, अब उसे वैश्विक स्थिरता के लिए आवश्यक माना जा रहा है।