देश और विदेश का मीडिया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगातार कोसे जा रहा है। उसे अहंकारी, तानाशाह, मति भंग, मूर्ख, अविश्वसनीय, मानवता विरोधी और न जाने क्या क्या दोषा रोपन कर निंदित किया जा रहा है। यहां तक कि उसके अपने मित्र देश भी किनारा करने लगे हैं। अमेरिकी अदालतें भी ट्रंप के फैसलों को धड़ाधड़ रद्द कर रही है। कुल मिला कर ट्रंप की छवि एक नाकाम खलनायक जैसी हो गई है। ईरान को लेकर ट्रंप की बड़ी छीछालेदर हुई है, और हो रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया की स्थित पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि हमें दीर्घकालीन जटिल परिस्थितियों ने जूझने के लिए सावधान रहना है क्योंकि परिस्थितियां हर पल बदल रही हैं।

श्री मोदी ने यह टिप्पणी वर्तमान परिवेश में की है किन्तु परिस्थितियों के सही आकलन के लिए अतीत में झांकना जरूरी है। बहुत पुरानी बात नहीं, 5 दशकों पहला घटनाक्रम है।

यह भी जानना ज़रूरी है कि वर्तमान ईरान पहले फारस कहलाता था। बोली फ़ारसी (पर्शियन), रहने वाले पारसी। सातवीं शताब्दी में अरबों के आक्रमण के बाद फारस का इस्लामीकरण हो गया। अग्नि को पूजने और आर्य मिहिर (आर्यों का प्रकाश) कहलाने वाले राजवंश सदियों तक सत्ता पर काबिज रहे। इस्लाम कबूल न करने पर कुछ पारसी अपना देश छोड़कर विदेशों में जा बसे। कुछ भारत भी आये जिनकी संतानों के नाम दादा भाई नौरोजी, जमशेद जी टाटा, होमी जहांगीर भाभा, रतन टाटा, सायरस पूनावाला, फिरोज़ शा, गोदरेज, जनरल सैम मानेकशॉ, भीकाजी कामा आदि। इन्दिरा प्रियदर्शनी के पति फिरोज़ भी पारसी थे जो महात्मा गांधी का उपनाम 'गांधी' अपने नाम के साथ लिखने लगे थे।

ईरान के इस्लामीकरण और इस्लामी कट्टरता तथा 'काफिरों' को दुनिया से मिटाने का संकल्प खुदा परस्त भूले नहीं हैं। वर्तमान युद्ध उस पुराने संकल्प का बदला हुआ रूप है।

पहलवी राजवंश के मोहम्मद रजा शाह पहलवी 22 वर्ष की आयु में सत्तासीन हुए। वे पश्चिमी सभ्यता के रंग में रचे बसे थे और कट्टरवादी इस्लामी मुल्ला मौलवियों के धार्मिक  सत्ता के विरोधी थे। रजा शाह ने राज्य को धर्म निरपेक्ष घोषित कर दिया, बुर्का प्रथा समाप्त कर दी तथा लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल कॉलेज खुलवाए। अमेरिका तथा यूरोपियन देशों की मदद से ईरान का आधुनिकरण, औद्योगिकरण किया। कच्चे खनिज तेल की रिफाइनरीज स्थापित की।

ईरानी शासक की नीतियों को ईरान के कट्टरपंथी मौलानाओं ने गैर इस्लामिक घोषित कर दिया। रजा शाह पहलवी को अमेरिका का पिट्ठू व गैर मुस्लिम (काफ़िर) बताया जाने लगा। ईरानियों को शाह के विरुद्ध यह कह कर भड़काया गया कि वह पैगम्बर और इस्लाम का दुश्मन है, ईरान का बादशाह पद पर रहने लायक नहीं। अयातुल्लाह (इस्लामी धार्मिक सर्वोच्च पद) पर आरूढ़ रूहोल्ला खामेनेई को इस्लामिक क्रान्ति का विरोध किया। परिस्थितियां ऐसी बनी कि रजा शाह पहलवी को 1 फरवरी, 1979 को सपरिवार ईरान से पलायन करना पड़ा। सत्ता पर अयातुल्लाह रूहोल्ला खामेनेई काबिज हो गया। उसने सत्ता परिवर्तन को इस्लाम की जीत बताया। धर्म निरपेक्षता, धार्मिक स्वतंत्रता, स्त्री शिक्षा सब खत्म हो गये। ईरान मध्यकालीन युग में पहुंच गया। रूहोल्ला खामेनेई ने 1989 तक ईरान को इस्लामी शासन के रूप में चलाया। उसकी मृत्यु के बाद अली हुसैनी खामेनेई सत्तारूढ़ हुआ जिसने इस्लामी कानून का नाम लेकर हजारों मुस्लिम महिलाओं की नृशंस हत्या कराई। पर्दा प्रथा का विरोध करने वाली हजारों औरतें उसकी क्रूरता का शिकार बनीं। अयातुल्ला अली खामेनेई ने सैकड़ों बार सार्वजनिक तौर पर कहा कि उसका लक्ष्य दुनिया के नक्शे से इज़राइल का नाम मिटाना है। यह कोरी गीदड़ भभकी नहीं थी। उसने न केवल परमाणु बमों का निर्माण किया बल्कि हजारों किलोमीटर दूर तक लक्ष्य को भेदने व विध्वंस मचाने वाली मिसाइलों का जखीरा एकत्र कर लिया। सेना में कट्टरपंथी तत्वों की भरती की और हूती समुद्री लुटेरों व आतंकी हिजबुल्ला की मजबूत फौज खड़ी की। दुनिया को बस में करने के उद्देश्य से होर्मुज जलडमरूमध्य के समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछवा दीं।

डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के इस्लामी शासक के इरादों की भनक तो थी, लेकिन यह ज्ञान नहीं था कि अली खामेनेई इज़राइल को नक्शे से मिटाने और विश्व विजेता या दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने का इरादा करे बैठा है। 9 अप्रैल, 1939 में पैदा हुआ अली खामेनेई 28 फरवरी, 2026 के अमेरिकी-इज़राइली हमले में मारा गया।

अब दुनिया को पता चल चुका है कि दुनिया में इस्लामी शासन स्थापित करने और संसार पर आधिपत्य जमाने के लिए ईरान ने क्या मंसूबे पाल रखे हैं। ईरान की जंगी तैयारियों को देख अमेरिका के विरोधी रूस व चीन के भी कान खड़े हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तीनों सेनाध्यक्षों व रक्षा सलाहकार से ईरान-अमेरिकी युद्ध की स्थिति पर विचार किया है। रक्षा मंत्री ने कहा है कि हमें ईरान से सबक लेकर दीर्घकालीन रक्षा नीति बनानी है। इज़राइल की तरह भारत भी चीन, बांग्लादेश व पाकिस्तान जैसे विरोधी देशों से घिरा हुआ है। घर में भेदिये और आस्तीन के सांप छिपे (बहुत से तो सामने से फुफकारते भी हैं) बैठे हैं।

यदि ट्रंप सामने न आते तो ईरान की तैयारियों व इरादों का क्या पता लगता। अन्तरराष्ट्रीय कानूनों को धता बताकर ईरान आज भी होर्मुज समुद्री मार्ग को कब्जाये बैठा है। उसकी हठधर्मी को तोड़ने वाला दुनिया में कोई नहीं।

यदि ईरान चाहे तो वह दुनिया को ब्लैक मेल कर सकता है। बंधक बना सकता है। ट्रंप की हरकतों (या दूरदृष्टि) ने सच्चाई से परदा उठा दिया है। इस विवाद को अमेरिका-इज़राइल-ईरान विवाद की नजर से देखना भूल होगी। यह पूरी दुनिया के लोगों की सुरक्षा, आज़ादी और अस्तित्व का सवाल है।

गोविंद वर्मा 

संपादक 'देहात'