भारत के लाखों फोटोग्राफी प्रेमियों के लिए 26 अप्रैल 2026 की तारीख दुःखदायी पीड़ादायक रही। 26 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय ख्याति के फोटो जर्नलिस्ट रघु राय का दिल्ली में 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके कैमरे ने भारत के इतिहास, वास्तु कला, अध्यात्म को दुनिया भर में पहुंचा कर विश्व के फोटो जगत में ऊंचा स्थान दिलाया। लंदन, इटली, फ्रांस, आस्ट्रेलिया में उनकी फोटो प्रदर्शनी में कलाप्रेमी टूट पड़ते थे। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में रघु राय के जीवन्त चित्रों को निहारने लोग ऐसे आते थे मानो तीर्थयात्रा पर जा रहे हों।
रघु राय का जन्म अविभाजित भारत के झांग (अब पाकिस्तान) शहर में 18 दिसंबर, 1942 में हुआ था। 23 वर्ष की आयु में वे सिविल इंजीनियर बन गये किन्तु इंजीनियरिंग के पेशे में नहीं आये। सेना में ड्राइंग इंस्ट्रक्टर पद पर नियुक्त हुए किन्तु कुछ दिनों बाद वह नौकरी छोड़ दी। रघु राय के बड़े भाई एस. पॉल भी अच्छे फोटोग्राफर थे। तब ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी का ज़माना था। एस. पॉल ने घर पर ही डार्करूम खोला हुआ था।
रघु राय की फोटोग्राफी के प्रति रुचि की एक दिलचस्प कहानी है। दोनों भाई किसी गाँव में गये हुए थे। वहाँ रघु राय ने एक गधे के बच्चे को दौड़ते हुए देखा। उन्होंने अपने भाई के हाथ से कैमरा लिया और झट से उसकी तस्वीर खींच ली। एस. पॉल ने चित्र को प्रोसेस करके एन्लार्जमेंट निकाला। यह चित्र एस. पॉल को इतना भाया कि उसे लन्दन के 'टाइम्स' अखबार में छपने भेज दिया। अखबार के कला संपादक को यह चित्र इतना हृदयग्राही लगा कि उसे रघु राय का नाम डाल कर अखबार के आधे पृष्ठ पर प्रकाशित किया। लन्दन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र में अपना खींचा हुआ फोटोग्राफ छपने से रघु राय ने फोटोग्राफी को करियर बनाया। कोलकाता का प्रमुख अंग्रेजी दैनिक 'स्टेट्समैन' के दिल्ली संस्करण में फोटोग्राफर बने। अखबार के समाचार संपादक आर.एन. शर्मा ने उनकी फोटोग्राफी को नया आयाम दिया, आगे बढ़ाया। रघु राय ने 'स्टेट्समैन' 1965 में ज्वाइन किया। दस वर्षों तक वहां काम करने के बाद नौकरी छोड़ फ्रीलांसर बन गए। रघु राय की ख्याति दुनियाभर में फैल चुकी थी। विश्व प्रसिद्ध फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसन ने उनकी प्रतिभा और फोटोग्राफी के प्रति उनके समर्पण भाव को पहिचाना। हेनरी ने अंतरराष्ट्रीय प्रेस फोटोग्राफरों की संस्था 'मैग्नम फोटोज' से रघु राय को जोड़ा और निर्णायक मण्डल में उन्हें जूरी चुना गया।
रघु राय ने फिल्म निदेशक सत्यजित रे, पं. रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल खां, हरि प्रसाद चौरसिया, इंदिरा गांधी, मदर टेरेसा के यादगार चित्र खींचे। मदर टेरेसा के रघु राय द्वारा लिए गए चित्र दुनिया भर में घूम गए। उनके चित्रों में कविता की भावना और गीतों की लय होती थी। रघु राय के चित्र पहले दौर में श्वेत-श्याम होते थे लेकिन उनमें हजारों रंग भरे रहते थे, जो दर्शक की आत्मा को झझकोर देते थे। जिस प्रकार महाकवि निराला ने काविता में सड़क किनारे पत्थर तोड़ती महिला का मार्मिक चित्रण किया, वैसे ही, रघु श्रमकान्त महिला मजदूर की अधखुली आंखों और उसके चारों ओर पसरी गरीबी, बेबसी को कैमरे में कैद कर लेते। भीषण गर्मी में प्यास से बिलबिलाते कौव्वे को नल से टपकती पानी की बूंद को गटकने का दुर्लभ दृश्य उनके कैमरे में समा जाता। वृद्ध महिला के चेहरे की एक एक झुर्री को कुशल चित्रकार की भांति उकेर देते। उगता हुआ सूरज या अस्ताचल को जाता सिन्दूर का गोला, प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते। दिल्ली का कूंचा चेलान हो, जामन वाली गली हो, दरीबा कलाँ हो या बाजार सीताराम अथवा जामा मस्जिद का मछली वालान, गली-गली, कूंचे-कूंचे तक उनके कैमरे की पहुंच थी।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देश में संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका हुआ था। उनकी पटना की रैली पर पुलिस ने बर्बर लाठी चार्ज किया। तब हर नौकरशाह और पुलिसिया चाकर इंदिरा गांधी की खुशफहमी हासिल करना चाहता था। जे.पी. पर भी लाठियां भांजी गई। रघु राय ने जे.पी और लाठी का ऐसा पल कैमरे में संजोया, जिसके अखबारों में छपते ही देश भर में भूकम्प आ गया। इस लाठीचार्ज के विरोध में संसद में जमकर हंगामा हुआ। यह चित्र भी सारी दुनिया में प्रसारित हो गया। इंदिरा सरकार को पटना लाठीचार्ज के लिए सदन में माफी मांगनी पड़ी।
कैमरे के माध्यम से माहौल को दिखाने का अनोखा हुनर रघु राय के पास था। लियो टॉल्स्टॉय के वार एंड पीस की तरह वे वातावरण को जीवन्त कर देते थे। युद्ध के दौरान थका हारा सैनिक हो, या जिन्दगी की जंग लड़ने पर उतारू सड़क का आम आदमी, सब रघु राय के ज़हन और कैमरे में कैद हो जाते। भोपाल गैस त्रासदी की विभीषिका को रघु राय ने ऐसा चित्रित किया कि पूरी दुनिया हिल गई और यूनियन कार्बाइड पर थू-थू होने लगी। उनकी एक तस्वीर, जो सन् 1977 में 'स्टेट्समैन' में छपी थी, इंदिरा गांधी द्वारा थोपे आपातकाल पर सीधा कटाक्ष करती थी। चित्र में एक महिला सफाई कर्मी सड़क पर झाडू लगा रही है और उसके एक हाथ में इंदिरा गांधी के नारे वाला फटा पोस्टर दिख रहा है जिस पर हम दो, हमारे दो का नारा लिखा है। सफाईकर्मी उसे कचरे के डिब्बे में डालती दिखाई दे रही है। इस फोटो ग्राफ ने बिना कहे, बिना बोले, सब कुछ बता दिया।

रघु राय ने फोटोग्राफी पर पचास से अधिक पुस्तकें लिखी। वे फोटोग्राफी जगत के बेताज बादशाह बन चुके थे। फोटो जर्नलिज्म के हीरो थे। जूम, टेली, वाइड एंगल लेंसों का ज़खीरा उनके पास था। चित्र खींचते समय डिस्टेंस, एपचर, लाइट, स्पीड, टाइम और एंगल, ऑब्जेक्ट सब मानो अपने आप सैट हो जाते थे। मानो वे उनके गुलाम हों। हर कुशल फोटो ग्राफर को इन तकनीकों का ध्यान रखना पड़ता है लेकिन रघु राय के मन-मस्तिष्क में यह सब समाया होता था।
1971 में पद्मश्री मिलने के साथ-साथ विश्वस्तरीय सम्मान मिले। रघु राय कहते थे कि फोटोग्राफर को असीम धैर्य चाहिए, तस्वीर तभी आकर्षक बनेगी। शायद कम लोगों को मालूम हो कि वे बागबानी और खेती से जुड़े थे। वह कहा करते थे भारत की माटी की सुगंध सारी दुनिया से न्यारी है। शनिवार और रविवार काम से विरत रहते थे और अपने बगीचे में पौधों की निराई-गुड़ाई में लिप्त रहते थे। रघु राय ने कहा था कि यदि मैं फोटोग्राफर न बनता तो कुशल माली होता। वे नहीं रहे लेकिन उनके द्वारा खींचे गए चित्रों का खजाना भारत की फोटोग्राफी को सदा गुलज़ार रखेगा। युवा फोटोग्राफरों के लिए वे लाइट हाउस की तरह चमकते रहेंगे। मैं व्यक्तिगत रूप से और समस्त 'देहात परिवार' से उनको श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'