बुधवार, 25 मार्च, 2026 को भारत की शीर्ष अदालत ने दो महत्वपूर्ण निर्णय किये। एक फैसला किसानों से अधिग्रहित की गई भूमि के मुआवजे और धनराशि पर सूद की अदायगी से संबंधित है, दूसरा हरियाणा पुलिस की दूषित, अन्यायपूर्ण रवैये से संबंधित है।
यह तथ्य है कि सरकार, सरकारी संस्थायें एवं अधिकरण मनमाने तरीके से किसान की जमीन कब्जा लेते हैं, और मनमाना मूल्य या मुआवज़ा अदा करते हैं। कभी-कभी तो मुआवजा धनराशि 20-20, 30-30 वर्षों तक अदा नहीं की जाती। इस अन्यायपूर्ण स्थिति पर लम्बा वाद-विवाद हो सकता है, यहाँ इसकी चर्चा नहीं करेंगे।
हालिया मामला भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का है। एनएचएआई ने वर्षों पूर्व अधिग्रहीत भूमि के मुआवजे की लंबित राशि व उस पर मात्र 5 प्रतिशत की दर से सूद देने का नियम बना डाला। प्राधिकरण का तर्क था कि यदि पुराने मामलों को आज के नियमों के अनुसार तय किया जाएगा तो 100 करोड़ रुपये के बजाय 29,000 करोड़ रुपये भुगतान करने पड़ेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकान्त, जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि किसानों को उचित मुआवजा देना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि सरकार के खजाने पर भार पड़ता है तो इस कारण किसानों या भूस्वामियों को उनके संविधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 5 के बजाय 9 प्रतिशत सूद अदा करने का भी आदेश दिया और कहाकि आप किसानों से उनका हक छीन नहीं सकते।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकान्त, जस्टिस जॉयमाल्या बागची एवं जस्टिस बिपुल एम. पंचोली की पीठ ने 3 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म के केस में हरियाणा पुलिस की गैर जिम्मेदारी व दोषियों को बचाने की हरकत के लिए जमकर फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस सब इंस्पेक्टर से लेकर पुलिस कमिश्नर तक सभी बच्ची व उसके मां-बाप के बयानों की उपेक्षा करने और दबाने में लगे रहे। किसी भी अधिकारी ने पीड़िता के परिजनों से मिलना तक गवारा नहीं किया। आरोपी को बचाने में पूरी ताकत लगा दी।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी हरियाणा पुलिस की अन्यायपूर्ण दूषित प्रणाली का दिग्दर्शन है। पुलिस सुधरने वाली नहीं। नेतृत्व में इतना साहस नहीं कि वह सुधारात्मक कदम उठा सके।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'