भारतीय वाङ्मय में समुद्र मंथन में अमृत एवं हलाहल (विष) निकलने का वर्णन है। विश्व कल्याण के निमित्त देवाधिदेव महादेव ने वह विष कंठ में धारण कर लिया और नीलकंठ कहाये।

प्रयागराज के माघ मेला में सन्तों, धर्माचार्यों, सनातन प्रेमियों की भीड़ जुटी है। कुछ ढोंगी, आडंबरी, ड्रामेबाज लोग भी भांति-भांति के लबादे और मुखौटे लगा कर त्रिवेणी घाट पर पहुंचे हैं।

लेकिन वहां पुण्य कौन कमा रहा है? मौनी अमावस्या पर 4 करोड़ 50 लाख श्रद्धालुओं ने संगम स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित किया। कौन है ये लोग जो हाड़ गलाती ठंड में ठिठुरते हुए, बसों, ट्रेनों, बैल गाड़ियों और पैदल ही माँ-बाप, बच्चों का हाथ पकड़े तीर्थराज पहुंचते हैं, त्रिवेणी घाटों पर डुबकी लगाते है, तिलक-सिंदूर लगवाते हैं, यथायोग्य दान दक्षिणा देते हैं, कंठी-माला खरीदते हैं और गंगा-जमना मैया को अर्घ्य अर्पित कर अपने छोटे से घरों, मड़ैया एवं झोपडी में लौट जाते हैं? वे हैं जो त्रिवेणी की रेती में कल्पवास कर रहे हैं। वे हैं जिनके पुरखे अहमद शाह अब्दाली, मोहम्मद गौरी, तैमूर लंग, हलाकू, बाबर, अकबर, औरंगजेब आदि-विदेशी हमलावरों से भारतीय सनातन सभ्यता-संस्कृति की रक्षा करते-करते शहीद हो गये किन्तु सदियों की गुलामी और बर्बर अत्याचारों के दौर में सनातन को बचा कर रखा।

कपटी-पाखंडी, नकली कथित शंकराचार्य से इन्हें कोई लेना-देना नहीं। भारतीय संस्कृति को अक्षुण्य रखने को जो अपने पूर्वजों की स्वर्णिम परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं, उनके चरणों में कोटिश प्रणाम !

किन्तु जो संगम तट पर चिन्तन शिविर लगाये पड़े हैं वे गंगा-यमुना-सरस्वती के तल से क्या निकाल कर लायेंगे, यह यक्ष प्रश्न है। राष्ट्रनिर्माण, राष्ट्र रक्षा, सकल समाज उत्थान के लिए सकारात्मक विचारों का अमृत कलश लेकर आयेंगे या फिर भारत की अस्मिता, स्वायत्ता, एवं महानता को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए नकारात्मक विचारों का जहर लेकर आयेंगे?

गोविंद वर्मा 

संपादक 'देहात'