विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 13 जनवरी के जिस Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026 नोटिफिकेशन के 15 जनवरी, 2026 के भारत सरकार के गजट में प्रकाशित होते ही, जब लोगों को ज्ञात हुआ कि यूजीसी के ये नियम अनिवार्यतः बाध्यकारी हैं तो पूरे देश में हल्ला मच गया। भारतभर में जो हुआ, वह प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये सब ने देख लिया। और जैसा कि देश की संवैधानिक परंपरा है, पीड़ितों को सुप्रीम कोर्ट के शरणागत होना पड़ा। यह प्रमाणित हो गया कि देशहित में निष्पक्ष और दबावरहित न्यायपालिका का होना अनिवार्य है। फैसले के बाद बाबर और जोगेंद्रनाथ मंडल के खानदानी सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध जो कोहराम मचा रहे हैं वह स्वाभाविक ही है। शीर्ष न्यायालय ने क्या किया, क्या कहा, संसद में क्या हुआ था, क्या कहा गया, पक्ष विपक्ष के नेता गिरगिट की तरह रंग बदलकर बरसाती मेंढकों की तरह उछलने लगे, यह भी देखा गया।

इस तरह यूजीसी का नोटिफिकेशन बहुत कुछ बता गया और आगे सावधानी बरतने, आंख कान खुले रखने का संदेश दे गया। अबतक का निष्कर्ष यह है:

अन्य राजनीतिक दलों की तरह भारतीय जनता पार्टी के मतदाता एवं समर्थक सिर्फ चुनावी रोबोट या कठपुतली नहीं हैं, जो नेताजी के बजरबट्टू घुमाते ही चालू हो जाते हैं।

लोगों ने दिखाया कि भाजपा से, नरेंद्र मोदी से ऊपर समाज का हित है। राष्ट्र से ऊपर कोई नहीं।

यह दिखाई पड़ा कि आरएसएस ने 100 वर्षों में जो कमाया, वह आड़े समय राष्ट्र के काम आयेगा। देश ने फिर यह देखा कि सुप्रीम कोर्ट में माफियाओं, देशद्रोहियों, घुसपैठियों के वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी क्या कहते हैं और शेर-ए-बब्बर विष्णु शंकर जैन कैसे दहाड़ते है।

यह भी पता चला कि 140 करोड़ की जनसंख्या वाला देश तभी जागता है जब उस पर आफत का पहाड़ टूटता है। फरवरी, 2025 में यूजीसी का ड्राफ्ट जारी हुआ, तब क्या सब सो रहे थे?

कांग्रेसी होने के नाते दिग्विजय सिंह को जो करना, उन्होंने कर दिया। संसदीय दल की कमेटी में भाजपा के राज्यसभा, लोकसभा के सदस्य भी थे। ये राहुल को पप्पू पप्पू कहते हैं क्या वे सभी पप्पूधिराज नहीं थे ? या फिर संसदीय समिति की बैठक में चाय-पकौड़ों का स्वाद लेने गये थे?

गजट में प्रकाशित होने से पहले ड्राफ्ट कई टेबिलों-फाइलों से होकर गुजरता है। पहला उत्तरदायित्व तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बनता है। क्या उनका पहला काम संसद और संसद के बाहर भाजपा व नरेंद्र मोदी का गुणगान करना है। उनके मातहत अधिकारी क्या गुल खिलाते हैं, यह क्या शिक्षा मंत्री को नहीं देखना था? राष्ट्र के व्यापक हित में होगा कि प्रधानमंत्री ऐसे लापरवाह एवं गैर जिम्मेदार मंत्री को अन्यत्र रवाना करें जिसने भाजपा को गहरी खाई में कूद जाने की स्थिति बना दी।

प्रधानमंत्री जी 27 यूरोपीय देशों के प्रमुखों को तो सहमत कर लेते हैं, अपने मातहतों पर नज़र नहीं रख सकते जो उनकी, देश की लुटिया डुबोने को बैठे हैं? प्रधानमंत्री के नाते नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारी सर्वोच्च है।

लोग 13-15 जनवरी की बात करते हैं। जरा 17 जनवरी की राहुल गांधी की पोस्ट पर दृष्टिपात करिये। लिखते हैं- 'रोहित वेमुला को मरे हुए 10 वर्ष हो गए। हम ऐसा भारत चाहते हैं जो न्यायपूर्ण एवं समान हो। जहां किसी दलित को अपने सपनों की कीमत, अपनी जान देकर न चुकानी पड़े। कर्नाटक, तेलंगाना मे रोहित वेमुला एक्ट बनायेंगे।... दलित युवाओं की हालत नहीं बदली।... दलितों के लिए क्लासरूम, हॉस्टल में वहीं हिंसा और कभी-कभी मौत भी है।... रोहित तुम्हारी लड़ाई हमारी जिम्मेदारी है।'

ये ही राहुल 29 जनवरी के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर मुंह बांध लेते हैं। मीडियाकर्मी पीछे-पीछे प्रतिक्रिया मांगते दौड़ते हैं और संसद से सड़क तक हंगामा बरपा करने वाले युवराज मौन साधे निकल जाते हैं। साजिश फिर फेल हो रही है। मोदी कंधे पर झोला टांगकर भागने वाले नहीं। नया रास्ता निकलेगा। एकलव्य और द्रोणाचार्य की पटकथा जागरूक भारत में फिर से नहीं लिखी जा सकती।

गोविंद वर्मा 

(संपादक 'देहात')