श्रीलंका में राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के नेतृत्व वाले NPP गठबंधन को संसदीय चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला है. शुक्रवार को जारी नतीजों में NPP ने श्रीलंका की संसद की 196 सीटों में से 141 सीटों पर जीत हासिल कर ली है. इस बीच, साजिथ प्रेमदासा की समागी जना बालवेगया (SJB) 35 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही.

श्रीलंका चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक काउंटिंग में NPP ने राष्ट्रीय स्तर पर करीब 62% या 68.63 लाख से अधिक वोट हासिल किए हैं. प्रेमदासा की मुख्य विपक्षी पार्टी समागी जन बालावेगया (SJB) को करीब 18 फीसदी, तो वहीं पूर्व राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के समर्थन वाले नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट (NDF) को महज 4.5 फीसदी वोट मिले हैं.

समय से पहले चुनाव का दांव कामयाब

राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके का श्रीलंका में समय से पहले चुनाव कराने का दांव कामयाब रहा. उनकी पार्टी ने संसदीय चुनावों में राष्ट्रपति चुनाव से भी बेहतर प्रदर्शन किया है.Sl Election Result

राष्ट्रपति के सलाहकार और श्रीलंका के पूर्व न्याय, वित्त और विदेश मंत्री मुम अली साबरी ने बताया कि कैसे जाफना जिले ने इतिहास में पहली बार दक्षिण में स्थित एक पार्टी को वोट दिया, जबकि तमिल पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा है. 55 वर्षीय वामपंथी लीडर अनुरा कुमारा दिसानायके जनता विमुक्ति पेरामुना (JVP) के प्रमुख हैं. श्रीलंका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब वामपंथी पार्टी सत्ता में आई है. अनुरा को चीन का करीबी माना जाता है.

श्रीलंका की संसद में बहुमत का गणित

225 सीटों वाली श्रीलंका की संसद में किसी भी दल को बहुमत के लिए 113 सीटों पर जीत हासिल करनी होती है. इनमें से 196 सीटों पर जीत का फैसला जनता वोटिंग के जरिए होता है, बची हुई 29 सीटों के लिए उम्मीदवार एक नेशनल लिस्ट के जरिए चुने जाते हैं.

नेशनल लिस्ट प्रक्रिया के तहत श्रीलंका तमाम सियासी दलों या निर्दलीय समूहों की ओर से कुछ उम्मीदवारों के नाम की लिस्ट चुनाव आयोग को सौंपी जाती है, बाद में पार्टी या समूह को जनता से मिले वोट के अनुपात में प्रत्येक दल की लिस्ट से उम्मीदवार चुने जाते हैं.

अग्नि-परीक्षा में पास हुए दिसानायके

गुरुवार को हुए संसदीय चुनाव राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके के लिए पहली बड़ी परीक्षा थी, वह सितंबर में ही 42.31 फीसदी वोट हासिल कर राष्ट्रपति चुने गए थे, लेकिन उनकी पार्टी के पास श्रीलंका की संसद में बहुमत नहीं था. जिसके चलते राष्ट्रपति ने संसद भंग कर समय से पहले चुनाव कराने के आदेश दे दिए थे. बता दें कि श्रीलंका में 2022 के आर्थिक संकट के बाद हुए यह पहले संसदीय चुनाव हैं.

श्रीलंका में लागू होंगे ये बदलाव?

राष्ट्रपति चुनाव के दौरान दिसानायके ने जनता से कई अहम बड़े वादे किए थे, उन्होंने एग्जीक्यूटिव प्रेसीडेंसी को खत्म करने का वादा किया था, इसके तहत श्रीलंका में शासन की ज्यादातर शक्तियां राष्ट्रपति के पास हैं. पहली बार 1978 में एग्जीक्यूटिव प्रेसीडेंसी सिस्टम लागू किया गया, जब राष्ट्रपति जयावर्धने सत्ता में थे. हालांकि बीते कई सालों से श्रीलंका में इस सिस्टम को खत्म करने की मांग की जा रही थी लेकिन किसी भी पार्टी ने ऐसा करने की हिम्मत नहीं दिखाई. दिसानायके ने राष्ट्रपति चुनाव से पहले देश के आर्थिक और राजनीतिक संकट के लिए इस सिस्टम को ही जिम्मेदार बताया था.