देश में दवाओं की गुणवत्ता और लाइसेंसिंग प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और एकरूप बनाने के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने नई पहल की है। इसके तहत दवा निर्माण लाइसेंस जारी करने और नवीनीकरण के लिए डोजियर आधारित प्रणाली लागू करने संबंधी विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
इस नई व्यवस्था का उद्देश्य पूरे देश में लाइसेंसिंग प्रक्रिया को व्यवस्थित करना और दवा निर्माताओं के लिए आवेदन प्रक्रिया को आसान बनाना है। हालांकि, यह नियम आयुष दवाओं, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल डिवाइस पर लागू नहीं होगा।
आवेदन मूल्यांकन होगा अधिक व्यवस्थित
नई गाइडलाइंस के तहत नियामक अब आवेदनों का मूल्यांकन एक समग्र और संगठित तरीके से कर सकेंगे। इसमें परीक्षण रिपोर्ट, प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों को एक साथ देखा जाएगा, जिससे अलग-अलग स्तर पर जांच की आवश्यकता कम होगी।
पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर
इस प्रणाली से निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और निष्पक्षता सुनिश्चित होगी। डोजियर आधारित मूल्यांकन पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक प्रभावी माना जा रहा है, क्योंकि इससे प्रक्रिया सरल होती है और बार-बार निरीक्षण की जरूरत घटती है।
बैठक के बाद शुरू हुई पहल
यह कदम दवाओं से जुड़ी सलाहकार समिति की 61वीं बैठक में हुई चर्चा के बाद उठाया गया। बैठक में दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई थी, जिसके चलते पूरे देश में एक समान नियम लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
डोजियर प्रणाली में क्या-क्या शामिल
नई व्यवस्था के तहत आवेदन को दो भागों में विभाजित किया गया है:
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भाग-A: कंपनी और निर्माण स्थल से जुड़ी जानकारी, जैसे साइट प्लान, कर्मचारियों की योग्यता और नियामक मंजूरी
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भाग-B: उत्पाद से संबंधित विवरण, जैसे स्थिरता परीक्षण, प्रक्रिया सत्यापन और बायोइक्विवेलेंस रिपोर्ट
नियामक तंत्र को मिलेगा लाभ
अधिकारियों का मानना है कि यह चेकलिस्ट आधारित प्रणाली नियामक ढांचे में स्थिरता और भरोसा बढ़ाएगी। साथ ही, यह आवेदकों और राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों को औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1945 के नियमों का पालन करने में मदद करेगी।
सभी राज्यों के नियामकों ने इस नई प्रणाली को अपनाने पर सहमति भी दे दी है, जिससे देशभर में एक समान प्रक्रिया लागू हो सकेगी।